अधिमास क्या है ?

अधिमास क्या है ?

हर 3 साल में क्यों आता है अधिमास ? क्या है इसका रहस्य ?

भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास की और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है । अधिक मास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है , जो हर 32 माह 16 दिन 8 घंटे के अंतर से आता है । सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए इसका आगमन होता है । प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन 6 घंटे (सौर वर्ष 365.2422 दिन )का होता है, वहीं चंद्रवर्ष 354 (चन्द्र वर्ष 354.327 दिन )का होता है । दोनों वर्षों के बीच 11 दिन ( 10.87 दिन ) का अंतर होता है । जो हर 3 वर्ष में लगभग 1 माह के बराबर हो जाता है । इसी अंतर को पाटने के लिए हर 3 साल में एक चंद्रमास अस्तित्व में आता है । इसे ही अधिक मास कहते हैं।

धार्मिक संस्कार जैसे गृह प्रवेश ,नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आमतौर पर नहीं किए जाते हैं । माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है इसी वजह से इस मास का नाम मलमास पड़ा है ।

भगवान विष्णु अधिक मास के स्वामी माने जाते हैं । पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है इसलिए अधिक मास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है ।

“यस्मिन चांद्रे न संक्रांति: सो अधिमासो निगह्यते ।

तत्र मंगल कार्यानि नैव कुर्यात कदाचन ।|

यस्मिन मासे द्वि संक्रान्ति क्षय: मास: स कथ्यते ।

तस्मिन शुभाणि कार्याणि यत्नत: परिवर्जयेत ।।

अधिमास व्रत व् कर्म नियम

अधिमास व्रत करने से पहले हम इसके बारे में जान लें । जिस मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती उस मास को अधिमास कहते हैं । लोक व्यवहार में इसे अधिक मास , मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं ।

इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि जिस मास में दो संक्रांतियां पड़ती हैं , उसे क्षयमास कहते हैं अधिमास 32 मास 16 दिन तथा 4 घड़ी के अंतर से आता है । जबकि क्षयमास मार्च 141 वर्ष बाद और फिर 19 वर्ष बाद पुनः आता है ।

अधिमास में फल प्राप्ति की कामना से किए जाने वाले प्राय: सभी कार्य वर्जित है । इसमें निष्काम भाव से ही कार्यों में रत रहना चाहिए । चैत्र आदि महीनों में जो महीना अधिमास हो उसके संपूर्ण 60 दिनों में से प्रथम मास की शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ करके द्वितीय मास की अमावस्या तक 3 दिन पर्यंत अधिमास के निमित्त उपवास तथा यथाशक्ति दान-पुण्य करना चाहिए ।

यह व्रत मनुष्यों के सारे पापों का नाशक है । इस महीने में दान-पुण्य करने का अक्षय फल होता है । यदि दान-पुण्य ना किया जा सके तो ब्राह्मणों तथा संतो की सेवा सर्वोत्तम मानी गई है । दान-पुण्य करने से धन कम नहीं होता , उसमें बढ़ोतरी ही होती है । जिस प्रकार एक छोटा सा बीज फल रूपी वृक्ष का रूप धारण कर के अनंत फल प्रदान करता है । उसी प्रकार मल या अधिमास में किया गया दान अनंत फलदायी होता है ।

इस के संदर्भ में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं“इस व्रत का फल दाता तथा भोक्ता मैं ही हूं ।”

अधिमास व्रत का इतिहास

कहते हैं, प्राचीन काल में राजा नहुष इंद्रपद प्राप्त पर कामातुर होकर पालकी में बैठा और सप्तर्षियों से पालकी उठवा कर इंद्राणी के घर की ओर चल पड़ा । राह में उसने ‘सर्प-सर्प’ कहकर ऋषियों को जल्दी न चलने के लिए अपमानित किया । तब ऋषियों के श्राप से वह सर्प ही हो गया । बाद में महर्षि वशिष्ठ के कहने पर राजा नहुष ने यह व्रत किया और सर्प योनि से मुक्त हुआ ।

अधिमास व्रत में पूजन कैसे करें

यह व्रत करने के लिए व्रत्ती को चाहिए कि प्रातः नित्य कर्मों से निवृत्त होकर विष्णु जी के सहस्त्रांशु (सूर्य) स्वरूप का विधिवत पूजन करें । घी , गुड़ तथा आटे के बने पुओं को कांसे के बर्तन में रखकर सहस्त्रांशु के निमित्त दान करें । इससे धन-धान्य व पौत्रादि में वृद्धि होती है ।

अधिमास का महत्त्व

हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है अधिक मास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है । हिंदू कैलेंडर में अधिमास की अवधारणा अंग्रेजी कैलेंडर के लीप वर्ष जैसी ही है । लीप इअर हर 4 साल बाद आता है जब फरवरी में 29 दिन होते हैं । वही हिंदू कैलेंडर मैं हर 3 साल में एक बार एक अतिरिक्त माह प्रकट होता है जिसे अधिक मास कहा जाता है । इसे मलमास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है ।

अधिक मास की शुरुआत के दिन चंद्र और सूर्य दोनों ही एक ग्रह कन्या राशि में विराजमान रहेंगे ।

हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है । लोग इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवत भक्ति , व्रत उपवास , जप और योग जैसे धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं । ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा पाठ से 10 गुना अधिक लाभ मिलता है । हिंदू धर्म में अधिक मास के दौरान सभी पवित्र कार्य वर्जित माने गए हैं ।

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