शिवावतारी गुरु गोरखनाथ का मंदिर

शिवावतारी गुरु गोरखनाथ का मंदिर

महा चमत्कारी एवं रहस्यमयी गुरु गोरखनाथ का मंदिर पूर्वी उत्तर प्रदेश ( पूर्वांचल) के गोरखपुर नगर में स्थित है । गुरु गोरखनाथ के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है । गुरू गोरखनाथ को हठयोग और नाथ संप्रदाय का प्रवर्तक कहा जाता है । गोरखनाथ और मछंदर नाथ को 84 सिद्धों में प्रमुख माना जाता है । गुरु गोरखनाथ ने साहित्य की प्रथम शुरुआत किया था । भारत की भूमि ऋषि – मुनियों और तपस्वियों की भूमि रही है । गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ के नाम से भी जाना जाता है । जिसका शाब्दिक अर्थ है ” गाय को रखने और पालन करने वाला या गाय की रक्षा करने वाला ” सनातन धर्म में गाय का बहुत ही धार्मिक महत्व है । मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवी – देवता निवास करते हैं । भारतीय संस्कृति में गाय को माता के रूप में पूजते हैं । गुरु गोरखनाथ का जन्म किसी स्त्री के गर्भ से नहीं हुआ था , बल्कि गोरखनाथ का अवतार हुआ था । गुरु गोरखनाथ का काल 9 वीं शताब्दी के मध्य में था ।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में गोरखपुर नगर में गुरु गोरखनाथ ने अपनी समाधि ली थी । गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ का एक भव्य और प्रसिद्ध मंदिर है । नेपाल नरेश नरेंद्रदेव जी गुरु गोरखनाथ के बहुत बड़े भक्त थे । वह गोरखनाथ से ही दीक्षा प्राप्त करके , उनके शिष्य बन गए थे । भगवान शंकर को नाथ संप्रदाय का संस्थापक कहा गया है । जिसके आदि गुरु भगवान दत्तात्रेय थे । भगवान दत्तात्रेय के शिष्य मत्स्येंद्रनाथ थे । वह ध्यान – धर्म और प्रभु उपासना के उपरांत भिक्षाटन करके अपना जीवन व्यतीत करते थे ।

सनातन पंचांग जो दुनिया का एकमात्र वैज्ञानिक कैलेंडर की मानें तो गुरु गोरखनाथ सभी युगों में थे तथा भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण से संवाद भी स्थापित किए थे । गुरु गोरखनाथ जी के जन्म काल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है । राहुल सांकृत्यायन के अनुसार गोरखनाथ का जन्म काल 845 ई. की 13 वीं सदी है ।

गोरखनाथ जी के जन्म के विषय में बताते हैं कि एक बार भिक्षाटन करते हुए गुरु मछंदर नाथ ( मत्स्येन्द्र नाथ ) एक गांव में पहुंचे । और एक घर के बाहर भिक्षाटन के लिएआवाज लगाई तो घर का दरवाजा खुला । और एक महिला ने मछंदर नाथ को अन्नदान किया और प्रणाम करते हुए आशीर्वाद मांगा कि मेरा पुत्र नहीं है । मुझे एक पुत्र चाहिए , जो वृद्धावस्था में मेरा उद्धार कर सके । मछंदर नाथ ने प्रार्थना स्वीकार करते हुए उस स्त्री को चुटकी भर भभूत उठा कर दिया । (भभूत से पुत्र प्राप्ति का वरदान देने की शक्ति मछंदर नाथ को शिव से प्राप्त हुआ था । उस समय शिव जी कहे थे कि मैं तुम्हारे दिये हुए भभूत से अवतार लूंगा और नाथपंथ का प्रसार करूंगा ।) महिला को मछिंद्रनाथ बोले भभूत को सुबह खाली पेट खा लेना । तो तुम्हें समयानुसार जरूर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी । जो बहुत ही तेजस्वी , धार्मिक होगा और उसकी ख्याति देश- विदेश में बढ़ेगी । और मैं 12 वर्ष बाद आऊंगा तो तुम्हारे घर का सुखद समाचार सुनकर , भिक्षा लूंगा । आशीर्वाद देकर भिक्षाटन करते हुए मछंदर नाथ आगे बढ़ गए ।

धीरे-धीरे 12 वर्ष बीतने के बाद भिक्षाटन करते हुए मछंदर नाथ फिर उसी गांव में आ गए । तो उस घर के समीप आते ही उस स्त्री की याद आ गई , जिसे भभूत दिए थे । उसके दरवाजे पर आवाज लगाते हैं तो वही स्त्री बाहर आयी । जब मत्स्यैन्द्रनाथ ने भभूत और बालक के विषय में पूछा तो उसके मुंह से आवाज नहीं निकली । बार – बार पूछने के बाद हिम्मत करके लज्जा , संकोच को छोड़कर सब कुछ सच-सच बता दिया । स्त्री ने कहा कि आप जब भभूत देकर गए । तो आस पास के पड़ोस की महिलाएं मेरा उपहास (खिल्ली ) करने लगी कि तुम किसी भी रास्ते चलते साधु संतों के उपर विश्वास करती हो , सही नहीं है । इसलिए मैंने उस भभूत को खाने के बजाय गोबर के गड्ढे के अंदर छिपा दिया था । गुरु मछंदर नाथ तो सिद्ध महात्मा थे । उन्होंने अपने ध्यान बल से देखकर तुरंत ही गोबर के गड्ढे के पास गए । और उन्होंने बालक को पुकारा तो गड्ढे से निकलकर उनके बुलाने पर एक 12 बरस का तीखे नाक नक्श , ऊंचे ललाट और आकर्षक , सुंदर , स्वस्थ बालक आकर उनके सामने खड़ा हो गया । गुरु मछंदर नाथ बच्चे को लेकर अपने साथ चले गए । यही बच्चा आगे चलकर गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

गुरु गोरखनाथ अपने बाल्यावस्था में लगभग 14 बरस की उम्र में मिट्टी के मूर्ति से एक बच्चे को उत्पन्न किया था । जिसको देखकर उनके गुरु मछंदर नाथ भी अचंभित हो गए थे । गुरु गोरखनाथ जी के नाम से नेपाल के गोरखाओं ने नाम पाया । नेपाल में राज्य गोरखा के जिले का नाम भी गोरखा इन्हीं के नाम से पड़ा है । यह प्रथम शताब्दी के पूर्व ‘नाथ जोगी ‘ थे । गुरु गोरखनाथ जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया और अनेक ग्रंथों की रचना की । माना जाता है कि गुरु गोरखनाथ सबसे पहले गोरखा जिलें में ही दिखे थे । गोरखा जिला में एक गुफा है जहां गोरखनाथ का पग-चिन्ह है , और उनकी एक मूर्ति भी है । यहां पर प्रत्येक वर्ष वैशाखी पूर्णिमा को एक उत्सव मनाते हैं और मेला भी लगता है । जिसे ‘रोट- महोत्सव‘ कहते हैं । गुरु गोरखनाथ जी का एक स्थान ऊंचे टीले गोगामेडी, राजस्थान हनुमानगढ़ जिले में भी है । इनकी मढ़ी सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नजदीक वेरावल में भी है ।

इनके साढ़े बारह पंथ होते हैं । शंकराचार्य के बाद गुरु गोरखनाथ को भारत का सबसे बड़ा संत माना जाता है । गोरखनाथ की परंपरा में ही आगे चलकर कबीर , गजानन महाराज , रामदेवरा , तेजाजी महाराज , शिर्डी के साईं आदि संत हुए । माता ज्वाला देवी के स्थान पर तपस्या करके उन्होंने माता को प्रसन्न कर लिया था । महान चमत्कारी और रहस्यमयी गुरु गोरखनाथ का समाधि स्थल गोरखपुर में ही है । यहां दुनिया भर के नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ जी के भक्त उनकी समाधि पर माथा टेकते हैं । इस समाधि मंदिर के वर्तमान समय के महंत , महंत आदित्यनाथ योगी जी है । गोरखनाथ जी ने नेपाल और भारत की सीमा पर प्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपाटन में तपस्या की थी । उसी स्थल पर पाटेश्वरी शक्ति पीठ की स्थापना हुई ।

भारत के गोरखपुर में गोरखनाथ का एकमात्र , प्रसिद्ध मंदिर है । इस मंदिर को यवनों और मुगलों ने कई बार ध्वस्त किया लेकिन इसका हर बार पुनर्निर्माण कराया गया । 9 वीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार कराया गया था । लेकिन इसे 13 वीं सदी में फिर मुस्लिम आतंकियों ने ढहा दिया था । बाद में फिर से इस मंदिर को पुनः स्थापित करके साधुओं का एक सैन्य बल बनाकर इसकी रक्षा करने का कार्य दिया गया । इस मंदिर के उप पीठ बांग्लादेश और नेपाल में भी स्थित है । संपूर्ण भारत के नाथ संप्रदाय साधुओं के प्रमुख महंत योगी आदित्यनाथ हैं । सभी दसनामी और नाथ संप्रदाय के लोगों के लिए गोरखनाथ का मंदिर बहुत ही महत्वपूर्ण है ।

महायोगी गुरु गोरखनाथ को मछंदर नाथ का मानस पुत्र और शिष्य दोनों कहा जाता है । गुरु गोरखनाथ और मछंदर नाथ से पहले नाथ संप्रदाय बहुत बिखरा हुआ था । इन दोनों ने मिलकर नाथ संप्रदाय को सुव्यवस्थित करके, इसका विस्तार किया था । गुरु गोरखनाथ को हठयोग और नाथ संप्रदाय का प्रवर्तक कहा जाता है । गुरु गोरखनाथ और मछंदर नाथ को 84 सिद्धों में प्रमुख माना जाता है । उनके उपदेशों में योग और शैवतन्त्रोंका समावेश है । गुरु गोरखनाथ ने पूरे भारत का भ्रमण किया तथा लगभग 40 रचनाओं को लिखा था । एक बार गुरु गोरखनाथ जंगल के मध्य में स्थित एक पहाड़ पर महादेव की तपस्या में लीन थे । गोरखनाथ जी की इस भक्ति को देखकर माता पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा ,’कि यह कौन है ? ‘ जो आप को प्रसन्न करने के लिए इतनी कठिन तपस्या कर रहा है । ‘ तब महादेव ने माता पार्वती को बताया कि “जनकल्याण और धर्म की रक्षा करने के लिए मैंने ही गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया है ।” इसलिए महायोगी गोरखनाथ को ‘ शिव का अवतार ‘ कहा जाता है

गुरु गोरखनाथ अपने योगबल और तपबल से चारों युगों में सशरीर जीवित रहते हैं :—-

(१)त्रेतायुग – त्रेता युग में गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ का आश्रम था । सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार श्री राम के राज्याभिषेक का निमंत्रण गुरु गोरखनाथ के पास भी गया था । और वह उस उत्सव में सम्मिलित भी हुए थे ।

(२) द्वापर युग – कई हिंदू ग्रंथों के अनुसार द्वापर युग में जूनागढ़ गुजरात में स्थित गोरख मढ़ी में गुरु गोरखनाथ ने तप किया था और इसी स्थान पर श्री कृष्ण और रुक्मणी का विवाह संपन्न हुआ था ‌। गुरु गोरखनाथ देवताओं के अनुरोध पर द्वापर युग में श्री कृष्ण और रुक्मणी के विवाह समारोह में भी अपनी उपस्थिति दी थी ।

(३) कलयुग — कलयुग काल के दौरान कहा जाता है कि राजकुमार बाप्पा रावल किशोरावस्था में एक बार घूमते- घूमते बीच बीहड़ जंगल में पहुंच गए । वहां उन्होंने एक तेजस्वी साधु को ध्यान में बैठे हुए देखा । जो कि गोरखनाथ बाबा थे । गुरु गोरखनाथ के तेज से प्रभावित होकर बाप्पा रावल ने उनके निकट ही रहना प्रारंभ कर दिया और उनकी सेवा करना प्रारंभ कर दिया । कुछ दिन बाद जब गोरखनाथ का ध्यान टूटा तो बप्पा रावल की सेवा से वह प्रसन्न हुए और उन्हें एक तलवार आशीर्वाद के रूप में दिया । बाद में इसी तलवार से मुगलों को हराकर चित्तौड़ राज की स्थापना बप्पा रावल ने किया था ।

गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित 40 रचनाओं में हिंदी भाषा के शोधकर्ता ‘बड़थ्वाल’ ने बताया है कि इनमें 14 रचनाएं अति प्राचीन है । आदि काल में नाथ पंथियों की हठ योग साधना आरंभ हुई । इस पंथ के चलाने वाले मछंदर नाथ तथा गोरखनाथ माने जाते हैं । इस पंथ के साधकों को अवधूत सिद्ध औघड़ कहा जाता है । यह कहा जाता है कि सिद्ध मत और नाथ मत एक ही है । गुरु और शिष्य दोनों को ही 84 सिद्धों में प्रमुख माना जाता है । और तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रूप में जाना जाता है । माना जाता है कि उन्होंने कई मंत्रों की सिद्धी भी की थी । जैसे –जंजीरा , साबर मंत्र, संजीवनी मंत्र , गायत्री मंत्र, रक्षा मंत्र आदि ।

नाथ संप्रदाय के संस्थापक भगवान शंकर को माना जाता है आदिनाथ (भगवान शंकर ) और दत्तात्रेय के बाद सबसे महत्वपूर्ण नाम गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का आता है । शंकर दिग्विजय नामक ग्रंथ के अनुसार 200 ईसा पूर्व मछिंद्रनाथ हुए थे । जो मीन नाथ और मछंदर नाथ के नाम से भी जाने जाते हैं । कॉल ज्ञान निर्णय के अनुसार मछंदर नाथ ही कॉल मार्ग के प्रथम प्रवर्तक थे । कुल का अर्थ शक्ति होता है और अकुल का अर्थ शिव होता है । यानी ये शिव रूप में थे । मछंदर नाथ के गुरु दत्तात्रेय थे । ये हठयोग के प्रथम गुरु हैं । जिन्हें मछंदर नाथ भी कहते हैं , इनकी समाधि उज्जैन के गढ़कालिका के पास स्थित है । कुछ लोग इनकी समाधि मछिन्द्रगढ़ में बताते हैं जो महाराष्ट्र के सावरगांव जिला के मायंबा गांव के निकट है ।

नव नाथ परंपरा की शुरुआत गुरु गोरखनाथ के कारण ही शुरू हुई थी ।और गुरु गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग किया करते थे । उन्होंने योग के कई आसन विकसित किए थे । उनके कई कठिन आड़े -टेढ़े आसनों को देखकर लोग अचंभित हो जाते थे । आगे चलकर कई कहावतें प्रचलित हो गयी । जैसे कोई उल्टा सीधा कार्य करता है तो कहते हैं , ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है ।

गोरखनाथ की हठयोग की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं :– चौरंगीनाथ , गोपीनाथ , चुणकरनाथ ,भर्तृहरिनाथ , जलन्धरीपाव ( जालंधर या जालिंदरनाथ ) आदि । 13 वीं सदी में इन्होंने ही गोरख वाणी का प्रचार प्रसार किया था । यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे । ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय , शिव को ही सत्य मानते थे । कुछ लोग नवनाथ के क्रम में बताते हैं कि मछंदर नाथ , गोरखनाथ , गहिनी नाथ , जालंधर , कृष्णपाद , भर्तृहरि नाथ , रेवणनाथ ,नागनाथ और चर्पट नाथ आते हैं ।

मछिंद्र गोरक्ष जालिन्दराच्छ , कनीफ श्री चर्पट नागनाथ: ।
श्री भर्तरी रेवण गैनिनामान , नमामि सर्वात नवनाथ सिद्धान ।।

नाथ शब्द का अर्थ होता है स्वामी । नाथ समाज हिंदू धर्म का एक अभिन्न अंग है । भगवान शंकर को आदिनाथ और दत्तात्रेय को आदिगुरू माना जाता है । इन्हीं से आगे चलकर नवनाथ और 84 नाथ सिद्धों की परंपरा शुरू हुई । जैसे — अमरनाथ , केदारनाथ , बद्रीनाथ , आदि तीर्थस्थल , भोलेनाथ , भैरवनाथ आदि नाम सुना जाता है । साईं बाबा ( शिर्डी ), गोगादेव , बाबा रामदेव , तिब्बत के सिद्ध भी नाथ संप्रदाय के ही थे ।

मकर संक्रांति का दिन , जगत पिता सूर्य की उपासना का पर्व है । इसलिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु गोरखपुर मंदिर पहुंचते हैं । और ये श्रद्धालु शिव अवतारी गुरु गोरखनाथ को अपनी आस्था की खिचड़ी चढ़ाते हैं । सबसे पहले गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ ब्रह्म मुहूर्त में खिचड़ी चढ़ाते हैं और श्रीनाथ जी की पूजा करते हैं ।

मकर संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने के पीछे गुरु गोरखनाथ का चमत्कारी कथा है –

एक बार की बात है कि गुरु गोरखनाथ कांगड़ा के ज्वाला देवी मंदिर में चढ़ाने के लिए खप्पर भरकर खिचड़ी ले जाने के लिए यहां आए थे । लेकिन आज तक न तो गुरु गोरखनाथ का खप्पर भरा और न तो गुरु गोरखनाथ वापस कांगड़ा लौट कर गए । आज भी वहां इनका इंतजार हो रहा है । मान्यता है कि त्रेता युग में भ्रमण करते हुए गुरु गोरखनाथ माता ज्वाला के स्थान पर पहुंचे । गोरखनाथ को आया देखकर माता स्वयं प्रकट हुई , और उन्होंने गोरखनाथ का स्वागत किया और भोजन के लिए आमंत्रित किया । देवी के स्थान पर वामाचार विधि से पूजन – अर्चन होता था और तामसी भोजन पकता था । किंतु गोरखनाथ जी वह भोजन नहीं ग्रहण करना चाहते थे । इसीलिए उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ खिचड़ी खाता हूं , वह भी भिक्षाटन से प्राप्त अन्न से पकी हुई खिचड़ी । इसपर ज्वाला देवी ने गुरु गोरखनाथ से कहा– ठीक है, आप खिचड़ी मांग कर लाए हैं तब तक हम पानी गर्म कर रहे है । गुरु गोरखनाथ भिक्षाटन करते हुए कौशल राज के इस क्षेत्र में आ गए । उस समय यहां घना जंगल था और जहां मंदिर है वह स्थान बहुत शांत सुंदर और मनमोहक था । गुरु गोरखनाथ इस स्थान से प्रभावित होकर यहीं ध्यान लगा कर बैठ गए । ध्यान में बैठे हुए गुरु के खप्पर में खिचड़ी चढ़ाने के लिए लोग जुटने लगे लेकिन गुरु जी का खप्पर नहीं भर पाया । और खप्पर नहीं भरने के कारण गुरु गोरखनाथ जी वापस कांगड़ा ज्वाला देवी के पास नहीं लौट सकेवहां आज भी इनका इंतजार हो रहा है और आज भी ज्वाला देवी के मंदिर में पानी का अदहन खौल रहा है

गोरखनाथ मंदिर पर मकर संक्रांति मेला

गोरखनाथ मंदिर पर मकर संक्रांति से शुरू होकर एक महीने तक मेला लगता है, जो देश विदेश में प्रसिद्ध है । इस गोरखनाथ मंदिर में नेपाल राजवंश की खिचड़ी हर साल चढ़ती है । मान्यता है कि नेपाल के राजवंश की स्थापना गुरु गोरखनाथ की कृपा से हुई थी और नेपाल के राजवंश के संस्थापक पृथ्वी नारायण शाह ने बांसी और चौबीस नाम से बंटी 46 रियासतों को एकजुट करके एकीकृत नेपाल की स्थापना किए थे । नेपाल शाही परिवार के मुकुट और मुद्रा पर आज भी गुरु गोरखनाथ का नाम अंकित है । मकर संक्रांति के अवसर पर विशाल भंडारा लगता है , जिसमें हजारों लोग शामिल होते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं । यह व्यवस्था मंदिर के प्रमुख महंत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की देखरेख में होता है ।

गोरखनाथ मंदिर के प्रधान सचिव द्वारका तिवारी का कहना है कि ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ बताते थे कि नेपाल से खिचड़ी की परंपरा की शुरुआत 1774 -1775 से हुई । राजमहल के निकट ही गुरु गोरखनाथ की एक गुफा थी । नेपाल के राजा नर भूपाल शाह और रानी कौशल्यावती के पुत्र राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह थे । राजा ने राजकुमार को मना किया था कि गुफा में मत जाना लेकिन अगर गए तो वहां के योगी जो भी कहे उसे मानना ,मना मत करना । एक दिन उत्सुकता बस राजकुमार गुफा में पहुंच गये । गुरु ने दही की मांग की तो राजकुमार अपने माता पिता के साथ दही लेकर गुरु के पास पहुंचे । योगी ने दही का आचमन कर युवराज की अंजुली में उल्टी कर दिया और कहा कि पी जाओ । युवराज की अंजुली से कुछ दही उनके पैरों पर गिर गयी । बालक को निर्दोष मानकर गुरु गोरखनाथ ने नेपाल के एकीकरण का वरदान दिया । इस वरदान के फल स्वरुप नेपाल के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने अपने 1722 से 1775 तक के कार्यकाल में हिंदू नेपाल अधिराज्य की स्थापना किये । तभी से गुरु गोरखनाथ को मकर संक्रांति पर खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई ।

नेपाल की सुख शांति के लिए मकर संक्रांति का प्रसाद गोरखनाथ मंदिर से नेपाल के राजा को जाता है । अब नेपाल में राजशाही के समाप्ति पर भी महंत आदित्यनाथ , गुरु शिष्य की परंपरा को कायम रखे हुए हैं । गुरु गोरखनाथ को नेपाल राजवंश का देवता माने जाने लगा । गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ सर्वप्रथम गुरु गोरक्षनाथ को खिचड़ी चढ़ाते हैं । उसके बाद नेपाल नरेश की खिचड़ी चढ़ाने की औपचारिकता पूरी की जाती है । यह परम्परा लंबे समय से चली आ रही है । नेपाल के राजगुरु के रूप में गुरु गोरखनाथ जी पूज्य हैं ।

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