पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का पुनीत पर्व “श्राद्ध”

पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का पुनीत पर्व “श्राद्ध”

भारतीय संस्कृति में जन-जन का यह अटूट विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात जीवन समाप्त नहीं होता , बल्कि जीवन को एक कड़ी के रूप में माना गया है , जिसमें मृत भी एक कड़ी है ।

प्राय: मृत व्यक्ति के संबंध में यह कामना की जाती है कि अगले जन्म में वह सुसंस्कारवान तथा ज्ञानवान बने । इस निमित्त जो कर्मकांड संपन्न किए जाते हैं उसका लाभ जीवात्मा को श्रद्धा से किए गए क्रिया- कर्मो के माध्यम से मिलता है । अतः मरणोत्तर संस्कार , श्राद्ध कर्म भी कहलाते हैं ।

श्राद्ध के माध्यम से पवित्र मन , वचन व कर्म से उन्हें तर्पण किया जाता है ताकि वे आत्माएं प्रसन्न रहें वह उन्हें शांति मिले । श्राद्धों का आयोजन सूर्य के कन्या राशि पर आने के समय में ही किया जाए तो सर्वाधिक उपयोगी है । श्राद्ध भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन कृष्ण पक्ष में अमावस्या तक कुल 15 दिन की अवधि ‘पितृ पक्ष’ कहलाती है । इसी अवधि में पितरों के प्रति श्रद्धा के प्रतीक श्राद्धों का आयोजन घर-घर में होता है ।

श्राद्धों को लेकर एक पौराणिक घटना महाभारत काल से भी जुड़ी मानी गई है , जिसमें कहा गया है कि कर्ण प्रतिदिन स्वर्ण दान किया करते थे । उन्हें मरणोपरांत स्वर्ग में रहने के लिए ‘स्वर्ण महल’ मिला, जहां प्रत्येक वस्तु सोने की थी । कर्ण इससे परेशान हो उठे । जब इसका कारण भगवान से पूछा तो पता चला कि वह प्रतिदिन सवा मन सोना दान करते थे , अन्य वस्तुओं का नहीं । यह जानकर कर्ण को बढ़ा संताप हुआ और वे ईश्वर से विनती कर 15 दिन के लिए पृथ्वी लोक में पुन: आए और सभी वस्तुओं का दान किया तथा मनुष्यों को भोजन करवाया । कहा जाता है कि इस कथा की स्मृति में ही पितरों के प्रति श्राद्ध मनाए जाने लगे ।

श्राद्ध के साथ मुख्य रूप से जुड़ी व्यक्ति की श्रद्धा है , साथ ही भावना भी , इसलिए आज के दिन परिवार के व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे काम , क्रोध , लोभ , मोह व अहंकार से दूर रहकर पुनीत कार्य करें । श्राद्ध कर्म में खर्च किए जाने वाला धन भी इमानदारी से कमाई किया हुआ ही होना चाहिए । अपने पितरों को पवित्र मन से तर्पण करने हेतु वर्ष में 2 दिन शुभ माने गए हैं । प्रथम — मृत्यु तिथि पर । और दूसरे — श्राद्ध के अवसरों पर उसी तिथि पर जिस दिन वह देवलोक को गया है ।

प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है कि श्राद्ध के दिनों में अपने सभी भूले बिसरों के लिए अमावस्या का दिन सर्वाधिक अनुकूल है । चूंकि इस दिन पितृलोक हमारे काफी नजदीक होते हैं । यदि किसी बाधावश श्राद्ध के दिनों में श्राद्ध न किया जा सके तो एकादशी के रोज भी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है । जिसका पुण्य उन्हें प्राप्त होता है । श्राद्ध न केवल पितरों का ही अपितु शिष्य , मित्र , गुरु या परिचित का भी किया जा सकता है । विधि विधान द्वारा परिवार में तीन पीढ़ियों तक का श्राद्ध किया जा सकता है । श्राद्ध करने का हक पुत्र या निकट के पुरूषजन को ही होता है । पुरुषों की अनुपस्थिति में ही स्त्रियां श्राद्ध कर सकती हैं ।

श्राद्ध करते समय यह जरूरी है कि अपने पितरों का नाम लेकर ही तिलांजलि दी जाए । साथ ही पवित्र जल हाथ में लेकर , जौ , चावल तथा चंदन डालकर आव्हान करें । पितृ आव्हान हेतु कलश स्थापित कर तिल की ढेरी लगाकर उस पर दीपक जलाए , व आस-पास पुष्प रखें । दीपक आटे के ही बनाएं व उनमें शुद्ध घी ही काम में लें । सभी परिजन हाथ में अक्षत लेकर मृत आत्मा का आव्हान करें व दीपक की लौ के सामने देखें व बीच में (विश्वे देवास मंत्र बोले, फिर अक्षत छोड़ दें ) पितृ यो नम: आवाहन यामि , स्थापायामि , का उच्चारण करें । इन मंत्रों के उच्चारण से पितर खुश होते हैं व उन्हें शांति मिलती है ।

भारतीय दर्शन के मतानुसार मृत्यु के पश्चात मनुष्य का स्थूल शरीर तो यहीं रह जाता है व उसका सूक्ष्म शरीर (आत्मा) अपने कर्मों केअनुसार फल भोगने हेतु परलोक सिधार जाती है । श्राद्ध करते समय पितरों के प्रति मौन रखना , उनकी स्मृति में जनमानस की सेवा हेतु कुछ भी पुनीत कार्य व निर्माण भी करवाया जा सकता है । इस दिन गरीबों को व पशुओं को भी भोजन खिलाया जाए तो उचित है । पितरों के नाम से दान भी किया जा सकता है ।

हिंदू संस्कृति में श्राद्ध करना सर्वश्रेष्ठ पुण्य का कार्य माना गया है । श्राद्ध करने से पितर वर्षभर संतृप्त रहते हैं । हमारी संस्कृति में श्राद्ध न करना बुरा माना गया है । ऐसे व्यक्तियों के लिए ‘पृथ्वी चंद्रोदय’ में मनु का कथन है—–

“न तत्र वीरा जायन्ते निरोगो न शतायुष: । न च श्रेयोधि गच्छन्ति यत्रा श्राद्धं विवार्जिता ।।

अत: जहां परिवारों में श्राद्ध नहीं होता , वहां न तो वीर पुरुष ही जन्मते हैं व न ही निरोगी होते हैं व न ही शतायु होते हैं व कल्याण प्राप्ति भी नहीं कर पाते , इसलिए ‘श्राद्ध’ पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि देने का पावन पुनीत पर्व भी है ।

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