भोजपुरी सिनेमा : भटक गई दिशाएँ

भोजपुरी सिनेमा के 50 वर्ष पूरे होने पर एक बार फिर उसकी पड़ताल शुरू हुई है कि भोजपुरी सिनेमा ने इन वर्षों में क्या वह मुकाम हासिल कर लिया है जिसकी उम्मीद पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पीयरी चढ़इबो’ से की गई थी। लेकिन यह दुखद स्थिति है कि जैसे-जैसे भोजपुरी सिने यात्रा आगे बढ़ी वह कमजोर होती गई। शुरुआती 14 वर्षों में जो जमीन बनी थी उस पर भावी भवन न बनकर कच्चे कारीगरों के हाथों ऐसा मकान बनाया गया जिसकी दीवार बहुत कमजोर थी। आज अगर हम हिंदुस्तान के क्षेत्रीय सिनेमा की बात करें तो बात साफ हो जाएगी। मराठी, तमिल, उड़िया, कन्नड़, गुजराती, बांग्लाआदि क्षेत्रीय सिनेमा के सामने भोजपुरी सिनेमा कहाँ ठहरता है भले ही उक्त क्षेत्रीय सिनेमा की उम्र भोजपुरी सिनेमा से बड़ी हो परयह सवाल महत्वपूर्ण है कि इस क्षेत्रीय सिनेमा ने लगातार अपने को जिस तरह प्रौढ़ किया उस प्रकार भोजपुरी सिनेमा अपने आप को प्रौढ़ क्यों नहीं कर पाया?क्षेत्रीय सिनेमा में बांग्ला,मराठी और तमिल सिनेमा अगर इतना समृद्ध है तो  इसका कारण यह है कि उसे योग्य निर्देशक एवं आलोचक मिले, जबकि भोजपुरी सिनेमा के आरंभिक दौर को छोड़ दें तो न तो कोई ऐसा निर्देशक मिला जो भोजपुरिया समाज के यथार्थ को अपने फिल्म में उतार सके और न कोई फिल्म  समीक्षक जो इस छूट रहे यथार्थ के लिए भोजपुरी फ़िल्मकारों को सतर्क करे।

पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण में जो जोश था वह बाद में व्यावसायिकता के दबाव में क्षीण होता चला गया। भोजपुरी अस्मिता तथा सामाजिक सरोकार के प्रश्न लगातार पीछे छूटते गए। ‘व्यावसायिकता’ किसी भी कला के लिए खतरनाक होती है। भोजपुरी सिनेमा में भी इस व्यावसायिकता ने संस्कृति और समाज के सवाल को कहीं दूर धकेल दिया है।  भोजपुरी सिनेमा से भोजपुरी समाज की समस्याएँ गायब हैं।

आज भी अधिकांश फिल्में बने बनाये पुराने फार्मूले पर बनती हैं। आज के समय तथा सामाजिक सरोकार से उनका कोई नाता नहीं है। भोजपुरी समाज के सामने आज इतनी विकट चुनौतियाँ हैं लेकिन यह चुनौतियाँ भोजपुरी सिनेमा में कहीं नहीं दिखाई देती है। भोजपुरी समाज शोषण, छुआ-छूत तथा सामंती जकड़न से आज भी मुक्त नहीं हो पाया है। अगर विकास की बात करें तो यह देश का सबसे कम विकासित क्षेत्रों में गिना जाएगा। यहाँ के  राजनेताओं ने इस क्षेत्र का उपयोग सिर्फ वोट बैंक के रूप में किया है।  यह क्षेत्र जीवन जीने की मूलभूत सुविधाओं तक से वंचित है।  ऐसे में आज सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी तथा इस बेरोजगारी से उत्पन्न हुए विस्थापन की  है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से अंग्रेजों ने इस देश में  औद्योगीकरण प्रारम्भ किया । जहाँ जिस प्रकार की कच्चे माल की सुविधा थी वहाँ वैसे छोटे-बड़े कारखानों की स्थापना के प्रयास प्रारम्भ हुए। अंग्रेजों के प्रोत्साहन से भारत में अमीर लोगों ने कारखाना लगाया। इसी के परिणाम स्वरूप बंगाल में जूट मिलें, अहमदाबाद और मुंबई मे कपड़ा मिलें, बिहार और मध्यप्रदेश में कोयला खदान, गाजीपुर में अफीम का कारखाना स्थापित किए गये । जिनमें भोजपुरिया समाज के लाखों लोगों को रोजगार मिला। इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक तक इन मिलों में भोजपुरिया  मजदूरों की संख्या सर्वाधिक है। पूर्णतः खेती पर आधारित यह समाज देश-दुनिया में रोजगार के लिए भटक रहा है। सरकार की कृषि संबंधी नीतियाँ इतनी घटिया हैं कि लोग गाँव छोड़ कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वे शहरों में 8 गुणा 8 के कमरों मे पाँच से छह लोग तक रहते हैं और दिन भर हाड़तोड़ मेहनत के बाद जो मिलता है उसी से जैसे-तैसे खुश हैं पर गाँव नहीं जाना चाहते। आज युवा पीढ़ी का गांवों से तेजी से पलायन हो रहा है। क्या यह  समस्या आज के भोजपुरी फिल्मों में उपस्थित है? अगर नहीं है तो खोट कहाँ है? यह सोचने की जरूरत है। राही मासूम रज़ा ने 1966 में इस समस्या की ओर अपने उपन्यास ‘आधागांव’ में ध्यान दिलाया था। जब वे लिखते हैं, ‘(इस क्षेत्र की कितनी बड़ी विडम्बना है) जब मुहब्बत की उम्र आती है तो गजभर की छातियों वाले बेरोजगारों को बेरोजगारी के कोल्हू में जोत दिया जाता है कि वे अपने सपनों का तेल निकालें और और उस जहर को पीकर चुपचाप मर जाय।…कलकत्ता की चटकलों में इस क्षेत्र के सपने सन के ताने-बाने में बुनकर दिसावर भेज दिये जाते हैं और फिर खाली आंखे रह जाती हैं और वीरान दिल रह जाते हैं और थके हुए बदन रह जाते हैं।’ भोजपुरी फ़िल्मकारों को अपने गिरेबान मे झांकना चाहिए और इस गलतफहमी से बाहर आना चाहिए कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन है। फिरोज रंगूनवाला ने लिखा है कि ‘सिनेमा और व्यक्ति अथवा समूह के रूप में दर्शकों के बीच नि:संदेह आदान–प्रदान चलता रहता है। सिनेमा अपने स्वरूप में ही कार्यप्रेरक है। यह दृश्य और श्रव्य चमत्कार तो पैदा करता ही है, इसमें भावनाओं, संबंधों, परंपराओं, धर्म, सेक्स तथा मानव चेतना तथा संवेदना से जुड़ी सभी अच्छाइयों एवं बुराइयों का शोषण करने की अद्भुत क्षमता है।’ सिनेमा से समाज की धारा को बदला जा सकता है, जिस समाज में तथा जिस समाज के लिए फिल्में बनती हैं, उसके समय का यथार्थ तो उनमें आना ही चाहिए, लेकिन अफसोस कि भोजपुरी सिनेमा अपने समय से काफी पीछे छूट गया है। भोजपुरी फिल्मों के युवा समीक्षक और कवि मनोज भावुक कहते हैं कि   ‘भोजपुरी फिल्मों में कुछ भी चल जाएगा का फ़ार्मूला अभी भी चल रहा है।भेंड़चाल अभी भी जारी है। अधिकांश फिल्में आज भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं।अभी भी फ़िल्मों में ठाकुर साहब रेप करते हैं और लाला जी मुंशीगिरी करतेदिख रहे हैं। भोजपुरी सिनेमा के लोगों को इस बात का ज्ञान कब होगा कि हमलोगदूसरी सहस्राब्दी के दूसरे दशक की  शुरुआत कर चुके हैं। समय के साथ चलनापड़ेगा।’

              भोजपुरी फिल्म निर्माताओं ने भोजपुरी समाज के मनोविज्ञान को बखूबी समझा है और उसके साथ लगातार खेलते रहे हैं। भोजपुरी फिल्मों का दर्शक वर्ग वही है जो सदियों से सामंती व्यवस्था में पिसता हुआ अपनी रोजी-रोटी के लिए हाड़तोड़ मेहनत करता रहा है। जिनके अंदर दमित इच्छाएँ कला के विविध माध्यमों से अभिव्यक्त होती रही हैं। भोजपुरी लोकगीत और लोकनाट्य इसके उदाहारण हैं। जिसमें भोजपुरी समाज अपने दमित  इच्छाओं और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता रहा है। भोजपुरी समाज में धर्मेंद्र, सन्नी देओल, मिथुन चक्रवर्ती, अजय देवगन इत्यादि की  मारधाड़ वाली फिल्मों की इतनी लोकप्रियता क्यों हैं? इसका कारण यही है कि सदियों से दमित समाज जब किसी अकेले नायक को आठ–दस की संख्या में सामंती  खलनायकों को पीटता देखता है तो उसे सुकून मिलता है, उसकी दमित इच्छाएँ तृप्त होती हैं। दर्शकों की इसी मनोवृत्ति को भोजपुरी सिनेमा ने भुनाना शुरू किया, क्योंकि उन्हें व्यवसाय करना था।  इस व्यवसाय के चक्कर में सामाजिक मुद्दे पीछे छूटते चले गए ।

भोजपुरी सिनेमा की संक्षिप्त  विकास यात्रा:

विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी द्वारा निर्मल पिक्चर्स के बैनर तले निर्मित कुन्दन कुमार द्वारा निर्देशित भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ की प्रेरणा पुरुष थे भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और यह सब कुछ संभव हो रहा था भोजपुरी सिनेमा के भीष्म-पितामह माने जाने वाले गाजीपुर उत्तर प्रदेश निवासी नाजिर हुसैन जी के कारण। इस फिल्म के कथा-पटकथा लेखक नजीर साहब हिंदी फिल्‍मों के विख्यात चरित्र अभिनेता होने के साथ-साथ एक संवेदनशील लेखक भी थे। ग्रामीण पृ‍ष्‍ठभूमि से संबंधित होने के कारण उन्‍होंने भोजपुरी भाषी क्षेत्र की विषम स्थितियों और सामाजिक समस्‍याओं को जिस तरह इस फिल्म में पिरोया है  वो काबिले तारीफ था। उनके अंदर भोजपुरिया समाज की तपिश इस कदर थी कि उन्होंने इस तपिश को कहानी के रूप में ढालकर अमर कर दिया। एक मुसलमान होते हुए भी नाजिर साहब ने भोजपुरी संस्कृति की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करते हुए फिल्म का नाम रखा ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ जिसमें उन्होंने  एक स्त्री के जीवन की कारुणिक कथा के साथ ही छोटे किसान की व्यथा, नशाखोरी, नफा-नुकसान, सूदखोरी का चक्र-कुचक्र स्त्री शिक्षा के प्रति जागरूकता, जाति विहीन समाज का निर्माण, ग्रामोत्थान में युवकों की सक्रिय भागीदारी जैसे कई महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मुद्दे उठाये। भोजपुरी फ़िल्म समीक्षक और पत्रकार आलोक रंजन के अनुसार, ‘16 फरवरी 1961 भोजपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक तिथि थी। आज के दिन पटना के शहीद स्मारक में भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का मुहूर्त समारोह संपन्न हुआ था और उसकी अगली सुबह इस फिल्म की शूटिंग शुरू की गयी…..निर्माण की सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद अंतत: 1962 के वर्षांत में यह फिल्‍म सबसे पहले बनारस के प्रकाश टॉकीज में प्रदर्शित हुई। अगले सप्‍ताह ही वहां आलम यह हो गया कि दूरदराज के गांव, कस्‍बों और शहरों से लोग खाना-पीना साथ लेकर बनारस पहुंचने लगे। थिएटर के बाहर मेले का दृश्‍य उपस्थित हो गया और एक नयी कहावत चल पड़ी, “गंगा, नहाs, बिसनाथ दरसन करs, गंगा मइया… देखs, तब घरे जा… !” गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ में मुख्य भूमिकायें नजीर हुसैन, कुमकुम, असीम कुमार, पद्मा खन्ना, लीला मिश्रा, हेलन आदि की थी। संगीत दिया चित्रगुप्त ने और गीत लिखे  शैलेन्द्र ने लता मंगेशकर तथा उषा मंगेशकर की आवाज में भोजपुरी गीत सुनना एक रोमांचक अनुभव था । इस फिल्म के सभी गीत एक से बढ़ कर एक थे, किन्तु फिल्म का शीर्षक गीत- ‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो, सैयाँ से कर दे मिलनवा…’ काफी चर्चित हुआ।

       ‘गंगा मइया तोहे पियरी …’ की जबरदस्त  सफलता के बाद  भोजपुरी फिल्मों के निर्माण ने तेजी पकड़ी और 1963 से लेकर 1967 के बीच सौ से ज्यादा भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की घोषणा की गई। इस दौर की जो बेहतरीन फिल्में आईं  उनमें बिदेसिया, लागी नाहीं छूटे राम, नइहर छूटल जाय, हमार संसार, बलमा बड़ा नादान, कब होई गवना हमार, जेकरा चरनवा में लगलें परनवा, सीता मइया, सइयां से भइलें मिलनवा, हमार संसार और भौजी, लोहा सिंह, विधवा नाच नचावे और सोलह सिंगार करे दुलहिनिया मुख्य हैं। ‘बिदेसिया’में जाति प्रथा, सामंती मूल्यों और ग्रामीण अभिजात्य वर्ग के प्रति विद्रोह का स्वर दिखायी देता है।  इसमें एक और महत्वपूर्ण बात थी कि भिखारी ठाकुर को गाते हुए फिल्माया गया है जो इस महान लोक कलाकार को अमरत्व प्रदान करती है। 1967 से 1977 तक के 10 साल में अगर जगमोहन मट्टू  की फिल्म ‘मितवा’(1970) जो चर्चित रही को छोड़ दें तो यहभोजपुरी सिनेमा का अंधकार युग है। इस युग में भोजपुरी फिल्मों का निर्माण लगभग बंद रहा । ‘बिदेसिया’ के निर्माता बच्चू भाई साह ने 1977 मे इस अंधकार युग का अंत करते हुए भोजपुरी की पहली रंगीन  फिल्म ‘दंगल’ का निर्माण किया। इस फिल्म में मुख्य भूमिका में थे सुजीत कुमार और मिस इंडिया प्रेमा नारायण। नदीम-श्रवण ने इस फ़िल्म में संगीत दिया । इस फ़िल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिये । इसी दौर में नाजिर हुसैन ने  राकेश पांडेय और पद्मा खन्ना को मुख्य भूमिका में लेकर फ़िल्म ‘बलम परदेसिया’ बनाई। ‘दंगल’ के बाद यह फ़िल्म इस दौर की सबसे चर्चित फ़िल्म रही।  अनजान और चित्रगुप्त के  खूबसूरत  गीत-संगीत से सजी इस फ़िल्म ने साबित कर दिया कि फिल्मों की सफलता में गीतों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।  बलम परदेसिया के बाद निर्माता अशोक चंद जैन ने ‘धरती मइया’ और ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ जैसी बेहतरीन फिल्में बनाई  जो भोजपुरी सिने इतिहास के कुछ खूबसूरत फिल्मों मे सुमार की जाती हैं भोजपुरी फिल्म निर्माण का ये दूसरा दौर 1977 से 1982 तक चला।भोजपुरी सिनेमा का यह वही दौर है जिसमें ज्यादातर फिल्मों में प्रेम और सामाजिक मूल्य सर्वोपरि रहे। ये फिल्में मुद्दा आधारित थीं। इनमें सामाजिक जीवन में मौजूद जड़ता, रूढ़िवाद, दहेज, नशाखोरी, छुआ-छूत, आर्थिक विषमता और जातिवाद जैसी समस्यायों को छूने की कोशिश की गयी। इन फिल्मों मे गाँव -जवार की हंसी-ठिठोली के साथ गाँव का सभ्य रूप भी देखने को मिलता है। फिल्मों में गाँव अपनी संपूर्णता में उपस्थित था। खेत-खलिहान, बैठका, हुक्का-बीड़ी, कहावतें, मुहावरे, लोकोक्तियां, गीत-संगीत, सब कुछ फिल्मों का हिस्सा था।

   1983 में मोहन जी प्रसाद की ‘हमार भौजी’,1984 में राज कटारिया की  ‘भैया दूज’, 1985 में लाल जी गुप्त की ‘नैहर के चुनरी’ और मुक्ति नारायण पाठक की ‘पिया के गांव’ 1986 में रानी श्री की ‘दूल्हा गंगा पार के’ जैसी इस दौर की कामयाब फिल्मों को छोड़ दे तो यह दौर बहुत आशा नहीं जगाता। यह वही दौर है जहां से हिन्दी फिल्मों की तर्ज पर भोजपुरी फिल्मों में भी तड़क-भड़क एवं मसाला मिलाने की प्रवृत्ति शुरू होती है। पर इस प्रवृत्ति को दर्शकों ने नकार दिया। परिणाम स्वरूप 1982 से 2002 तक फिल्में कब बनी और कब पर्दे से उतर गयीं पता ही नहीं चला। भोजपुरी सिनेमा के क्षरण होने का  यह शुरुआती  दौर है। 

   नयी सदी में नए कलेवर और तेवर के साथ भोजपुरी फिल्मों का निर्माण शुरू हुआ। 2003 में विश्वनाथ शाहाबादी के भांजे मोहनजी प्रसाद ने भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार माने जाने वाले रविकिशन को लेकर‘सैयां हमार’ और  ‘सैयां से कर द मिलनवा हे राम’ दो फिल्में बनायी। इन दोनों फिल्मों की सफलता के साथ भोजपुरी सिनेमा का एक नया दौर शुरू होता है।यह भोजपुरी सिनेमा का पूर्णतः व्यावसायिक दौर है । इसी क्रम में 2005 में प्रदर्शित मनोज तिवारी और रानी चटर्जी अभिनीत  सुधाकर पाण्डेय की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ने अब तक के भोजपुरी सिने इतिहास में कमाई के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये। मात्र 30 लाख की लागत से निर्मित इस फ़िल्म ने लगभग 15 करोड़ की कमाई की। इसके बाद भोजपुरी फिल्मों की बाढ़ सी आ गयी । कम पैसे में एक बड़े व्यवसाय के लालच ने फ़िल्मकारों की भरमार लगा दी। इसी फ़िल्म की सफलता ने अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जूही चावला, मिथुन चक्रवर्ती जैसे हिन्दी फिल्मों के चर्चित  कलाकारों और कई बड़े निर्माता-निर्देशकों को भोजपुरी फिल्‍मों की तरफ आकृष्ट किया। अब भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग मॉरिशस और सिंगापुर में होने लगी। मनोज तिवारी के इस सफलता के बाद भोजपुरी सिनेमा में गायकों एवं अभिनेताओं की एक नयी पीढ़ी आई। जिसमें दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’, पवन सिंह, पंकज केसरी, विनय आनंद, कृष्णा अभिषेक और नयी हिरोइनों में रानी चटर्जी, नगमा, भाग्यश्री, दिव्या देसाई, पाखी हेगड़े, रिंकू घोष, मोनालिसा, श्वेता तिवारी जैसे कलाकार शामिल हैं । दिनेश लाल यादव ने बिरहा गायकी से फिल्मों तक का सफर तय करते हुए  ‘निरहुआ रिक्शा वाला’,  दाग, सात सहेलियां’, आज के करण-अर्जुन, शिवा जैसी फिल्मों से काफी सोहरत बटोरी है । [quote]आकड़ों के अनुसार 2012 में लगभग 55 भोजपुरी फिल्में प्रदर्शित हुई जिनमें मात्र 2 फिल्में ही सुपरहिट हो सकी।[/quote]

    भोजपुरी फिल्मों की यात्रा लगातार जारी है पर इसमें है क्या? सिर्फ 2-4 तड़क-भड़क वाले गाने और वही पुराना मुंशी जी और ठाकुर साहब वाला पैटर्न, इन फिल्मों से आज का समय ही गायब  है। भोजपुरी फ़िल्म निर्माण अब पूर्णतः व्यवसाय बन चुका है। अब संस्कृति गौण हो गयी और व्यवसाय प्रमुख हो गया। कला की जगह लाभ अहम हो गया। भोजपुरी और हिन्दी फिल्मों के चरित्र अभिनेता विजय खरे अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि  ‘आजकल जो फिल्में बन रहीहैं, उन्हें बनाने वाले अधिकतर लोग भोजपुरिया समाज से बाहर के हैं। उनकाहमारे समाज और संस्कार से कोई लेना देना नहीं है। ऐसे में इन निर्माताओं नेपैसा कमाने का जरिया भोजपुरी सिनेमा को बनाया। वे साफ-सुथरी भोजपुरीफिल्मों में वे हिंदीनुमा स्टाईल में अश्लीलता परोसना शुरू कर दिए।अश्लीलता की वजह से फिल्में अच्छी कमाई कर लेती हैं, लेकिन उससे संभ्रांतलोगों का नाता टूट गया है।’ अर्धनग्नता की संस्कृति मुंबई की भले हो भोजपुरी समाज की तो नहीं ही है । भोजपुरी फिल्मों में नायिकाओं को जिस तरह से पेश किया जा रहा है वह इस भोजपुरी संस्कृति के एकदम विरुद्ध है । भोजपुरी फिल्मों के युवा समीक्षक और कवि मनोज भावुक भाषा और अश्लीलता के सवाल पर कहते हैं कि ‘भोजपुरी सिनेमा में भाषा की बहुत गड़बड़ी है। एक ही घर में चार भाई चार तरह की भोजपुरी बोल रहे हैं, जो कि बिल्कुल ही अव्यवहारिक है। मां के लिए बेटा हो का प्रयोग करता है, तो भाभी के लिए रे का। भोजपुरी में संबंध और संबोधन का निर्वाह होता है, जो कि फिल्मों में नहीं किया जा रहा है। गीतों में अश्लीलता और भोंडापन भरता जा रहा है। संगीत ज्यादातर घिसे-पिटे और कॉपी-पेस्‍ट टाइप के हैं। कई ऐसे गीतों को दर्शकों पर थोपा जाता है। जिसका फिल्म की कहानी से कोई लेना-देना नहीं होता। इन्‍हें देख के लगता है कि किसी साफ कपड़े में कोई पैबंद चिपका दिया गया है।’

          कुल मिलाकर आज भोजपुरी फिल्मों की बाढ़ के बीच यह सोचना जरूरी हो जाता है कि इन फिल्मों का निर्माण किस समाज के लिए हो रहा है? इन फिल्मों के माध्यम से भोजपुरी फ़िल्म निर्माता कैसा समाज गढ़ना चाहते हैं ? क्या फ़िल्म निर्माण सिर्फ एक व्यवसाय ही है या कि उसके कुछ सामाजिक उत्तरदायित्व भी हैं? जिस विजन के तहत भोजपुरी सिनेमा की यात्रा शुरू हुई थी उससे हम कहाँ भटक गए हैं ? इन सभी सवालों पर विचार करना आज जरूरी हो गया है नहीं तो  हिंदुस्तान के क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास मे भोजपुरी सिनेमा का नाम कहीं नहीं रहेगा ।

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