प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य की रूपरेखा

प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य की रूपरेखा

प्रिय पाठकों , आज मैं आप लोगों को पूर्वांचल राज्य जन आंदोलन द्वारा , प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य के विषय में , पूर्वांचल की रूपरेखा प्रस्तुत करने जा रहा हूं ।

यह पूर्वांचल राज्य उत्तर मध्य भारत का एक भौगोलिक क्षेत्र है , जो उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित है । नेहरू युग में 7 जुलाई 1952 में लोकसभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहां था , ” मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात से सहमति रखता हूं कि उत्तर प्रदेश का बंटवारा किया जाना चाहिए । इसे 4 राज्यों में विभाजित किया जा सकता है । हालांकि मुझे संदेह है कि उत्तर प्रदेश के कुछ साथी मेरे विचार को शायद ही पसंद करेंगे । संभवत: मुझसे विपरित राय रखने वाले साथी , इसके लिए अन्य राज्यों के हिस्सों को शामिल करने की बात कहें ।”

1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना । हालांकि इसने उत्तर प्रदेश के विभाजन की बात नहीं की थी । लेकिन आयोग के एक सदस्य इतिहासकार और राजनयिक नई के . एम . पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश के विशाल आकार के कारण पैदा होने वाले असंतुलन को लेकर चिंता जताई थी । उन्होंने संकेत दिए थे कि भारतीय संविधान की सबसे बड़ी और मूलभूत कमजोरी किसी एक राज्य विशेष और शेष अन्य राज्य के बीच व्यापक असमानता का होना है ।

58 साल से उत्तर प्रदेश में से पूर्वांचल राज्य को अलग करने का प्रयास किया जा रहा है । जब आजादी के बाद 1962 में गाजीपुर के कांग्रेस सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने संसद में रोते हुए पूर्वांचल के पिछड़ेपन का चर्चा किया था ।

यह देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश देश का सबसे पिछड़ा इलाका है । जबकि कुदरत ने इस इलाके को वह सब कुछ दिया है , जिसके कारण वह खुद अपने संसाधनों पर विकास कर सकता है । विकास की दृष्टि से देश में पहले नंबर पर आ सकता है । सभी प्राकृतिक संसाधन इस इलाके में मौजूद हैं । नदियां , खनिज पदार्थ , प्राकृतिक सौंदर्यता , इतिहास व संस्कृति , शिक्षा , धर्म – परंपरा सब कुछ है । यानी सब कुछ होते हुए भी पूर्वांचल का इलाका सामाजिक राजनीति और आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है । यहां का पारंपरिक रोजगार तहस – नहस हो चुका है ।

समय-समय पर साठ के दशक में पूर्वांचल के पिछड़ेपन की आवाज उठाने वाले गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ गहमरी को याद किया जाता है , जिन्होंने संसद में पिछड़ेपन के मुद्दे को बेहद भावुक अंदाज में लोकसभा में पेश किया था । तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आंखें भी आंसुओं से भर गई थी । उसी समय पटेल आयोग का गठन किया गया , उसकी रिपोर्ट भी आ गयी । लेकिन क्रियान्यवयन अभी तक नहीं हो सका । इसका परिणाम यह हुआ कि पूर्वांचल लगातार पिछड़ता जा रहा है । इसके पीछे राजनीतिक दलों की उदासीनता , सीधे तौर पर जिम्मेदार रही है । क्षेत्रीय प्रतिनिधी , यदि पटेल आयोग की रिपोर्ट पर संसद में सक्रिय दबाव बनाए होते तो पूर्वांचल के हर जिले की तस्वीर कुछ और ही होती । कांग्रेसी सांसद विश्वनाथ गहमरी की पहल करने पर जो पटेल आयोग

गठित किया गया था उसमें पूर्वांचल के 28 संसदीय क्षेत्रों का समावेश था । जिसमें गाजीपुर प्रदेश का सबसे पिछड़ा और सुविधा विहीन जिला था । 1962 में कांग्रेसी विधायक विश्वनाथ गहमरी ने संसद में अपने पहले संबोधन में जिले की दुर्दशा और गरीबी का जिक्र करते हुए कहा था । कि इस जिले सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग भुखमरी के कारण , अपना जीवन यापन करने के लिए पशुओं के गोबर से अनाज बीन कर उनके आटे को रोटी बनाकर खाते हैं। उनकी यह बात सुनकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित पूरे सांसदों की आंखों में आंसू भर गया था । उस संबोधन के बाद सांसद विश्वनाथ जी ट्रेन से गहमर आ गए थे ।उधर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जी ने तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री सत्यनारायण सिंहा को गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ जी से तत्काल बात कराने का निर्देश दिया । इसके बाद गहमरी जी के दिल्ली में नहीं रहने के कारण सिंहा ने गाजीपुर के कलेक्टर से बात कर गहमरी जी से बात कराने को कहा । फिर तत्कालीन वित्त सचिव एफ. एम . पटेल की अध्यक्षता में आयोग गठित कर गाजीपुर सहित पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास पर रिपोर्ट मांगी गई थी ।

कांग्रेस की सरकार के बाद देश में जनता पार्टी , जनता दल , भाजपा की सरकारें बनी । लेकिन पूर्वांचल और गाजीपुर की तस्वीर जस की तस आज भी बनी हुई है । 1999 में लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने चुनाव प्रचार के दौरान , गाजीपुर के लंका मैदान में भाजपा प्रत्याशी को जिताने की अपील करते हुए जनता से वादा किया था । कि जिले के विकास के लिए पटेल कमिशन की रिपोर्ट को कुछ संशोधन के साथ लागू किया जाएगा । चुनाव हुए बाजपेयी सरकार बन गई , लेकिन इस घोषणा पर कोई अमल नहीं किया गया । 2014 का लोकसभा और 2017 का विधानसभा चुनाव हुआ , लेकिन कोई राजनीतिक दल या नेता इसे मुद्दा नहीं बनाया । इससे बात साफ होती है कि जिले के पिछड़ेपन पर किसी का ध्यान नहीं है । 2019 के चुनाव के पहले दिल्ली के सी . एम . आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने पृथक पूर्वांचल राज्य का बिगुल फूंका तो सियासी हलचल तेज हो गयी ।

पूर्वांचल में कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि कभी गंगा की बाढ़ तो कभी प्रशासनिक एवं राजनीति स्तर पर भ्रष्टाचार होती रहती है । पूर्वांचल की लाचार स्थिति पर जब दृष्टि पड़ती है , तब सांसद विश्वनाथ गहमरी याद आते हैं । संसद में जिनके करुणामयी दृश्य को देखकर वहां उपस्थित माननीय अवाक रह गये और नेहरु जी रो पड़े थे । जिस पटेल आयोग की गठन की गई उस आयोग के सदस्यों में आर . डी . धर , आर . एन . माथुर , कृष्ण चंद्र विषयों के विशेषज्ञ थे । इन पर पूर्वांचल की समस्याओं और उपलब्ध संसाधनों की समीक्षा के लिए प्रदेश के 4 जिलों गाजीपुर , जौनपुर , आजमगढ़ और देवरिया (तत्कालीन मऊ ,आजमगढ़ का, और कुशीनगर देवरिया का हिस्सा था ) की आर्थिक तथा सामाजिक दशा और विकास संबंधी समस्याओं का बारीकी से अध्ययन , इनमें प्रथम दो पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान हुई प्रगति का मूल्यांकन तथा तृतीय पंचवर्षीय योजना के लिए विकास की योजना पर विचार विमर्श , साथ ही अध्ययन द्वारा प्रशासनिक एवं वैकल्पिक सुझाव का भार सौंपा गया था । उस जिले में आयोग द्वारा अनेक स्थलों का स्थलीय निरीक्षण व संबंधित विषयों पर जांच कर 2 साल बाद पांच खंडों में अपनी रिपोर्ट सौंपी । जिसमें प्रस्तावित जिलों के लिए उन जिलों की आवश्यकतानुसार अलग-अलग संस्तुतियां की गई । उसमें गाजीपुर को व्यवसायिक केंद्र बनाने के उद्येश्य से गाजीपुर मुख्यालय के पास गंगा नदी पर रेल तथा सड़क पुल का निर्माण , फल संरक्षण , कैनिंग इंडस्ट्रीज , चर्म उद्योग , हैंडलूम उद्योग , प्लास्टिक व खिलौना उद्योग की स्थापना , तथा कृषि के लिए सिंचाई संसाधन बढ़ाने की संस्तुति की गयी । संस्तुति के आधार पर सड़क पुल का निर्माण तो हो गया । लेकिन रेल पुल (जो ताड़ीघाट से गाजीपुर को जोड़ता है ) व अन्य स्तुतियां जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । जितनी 1962 में पूर्वांचल के लोगों द्वारा बार-बार भेजे गए पत्र के बावजूद शीर्ष नेतृत्व की अनदेखी का शिकार है ।

कहा जाता है कि राज्यों का क्षेत्रफल सीमित हो तो प्रशासन अच्छा होगा । अच्छी सुविधा मिलेगी , और अच्छा विकास होगा ।आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में चौतरफा विकास करके इसे सत्य साबित कर दिया है । उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड और मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ की विकास की सूरत बदल गई है । ऐसे में प्रदेश का विभाजन करना सही है । कांग्रेस पार्टी उपाध्यक्षडॉ राजेश मिश्र के अनुसार छोटे-छोटे राज्यों के गठन से प्रशासनिक ढांचा तो मजबूत होगा ही राजनीतिक दृष्टि से भी लोगों को लाभ मिलेगा , केंद्र से भी लाभ मिलेगा । लेकिन रोजगार का सृजन करने में कठिनाई आएगी । राज्यों के गठन में प्राकृतिक संसाधन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं । ऐसे में पूर्वांचल राज्य की बात किया जाए तो सोनभद्र ही एकमात्र ऐसा स्थान है , जहां प्राकृतिक संसाधन भरपूर है । लेकिन अब वहां भी आधा हिस्सा समतल हो चुका है । इस प्रकार पूर्वांचल राज्य के गठन से प्राकृतिक संसाधनों के अभाव में फायदा कम होगा ।

समाजवादी पार्टी ने मौजूदा उत्तर प्रदेश के सम्यक विकास की पक्षधर हैं । छोटे राज्यों से न तो राजनीतिक तौर पर लाभ होगा , और न तो आर्थिक रूप से लाभ होगा । बहुजन समाज पार्टी की मुखिया बहन मायावती ने उत्तर प्रदेश को चार भागों में बांटने का काम किया था । बहन मायावती ने विधानसभा में इसका प्रस्ताव पारित कराया था , और पार्टी पूरी तरह से पूर्वांचल राज्य के समर्थन में है । इस समय सत्ता में बहुजन समाज पार्टी नहीं है , लेकिन सत्ता में आते ही इसका फिर से प्रयास करेगी ।

उत्तर प्रदेश से अलग करके उत्तराखंड राज्य , सन 2000 में बना था । नवंबर 2011 में तत्कालीन मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार राज्यों ( पूर्वांचल , बुंदेलखंड , पश्चिमी प्रदेश और अवध प्रदेश ) में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित करके केंद्र सरकार के पास भेजा था । जिसे केंद्र सरकार ने नामंजूर करते हुए वापस कर दिया था । कुमारी मायावती जी हमेशा से उत्तर प्रदेश के बंटवारे के पक्ष में रही हैं । मायावती के अनुसार ( 1)पूर्वांचल में 32 जिले और राजधानी वाराणसी या इलाहाबाद रहेगा । (2) बुंदेलखंड में 7 जिला और राजधानी झांसी रहेगा । (3) पश्चिमी प्रदेश में 22 जिले और राजधानी मेरठ या मुरादाबाद रहेगा । (4) अवध प्रदेश में 14 जिले जिसकी राजधानी लखनऊ रहेगी । ऐसा प्रस्ताव पास किया था ।

लेकिन अब उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में बांटने का प्रस्ताव चल रहा है (1) उत्तर प्रदेश – जिसकी राजधानी लखनऊ रहेगी और इसमें 20 जिले होंगे ।(2) बुंदेलखंड – जिसकी राजधानी प्रयागराज होगी और इसमें 17 जिले शामिल होंगे । (3) पूर्वांचल – तीसरा राज्य पूर्वांचल बनेगा इसकी राजधानी गोरखपुर होगी और इसमें 23 जिले होंगे ।

सहारनपुर मंडल के तीन जिले – हरियाणा में शामिल होंगे । मुरादाबाद मंडल के सभी जिले – उत्तराखंड में शामिल होंगे । मेरठ मंडल के 5 जिले ( बागपत , गाजियाबाद , हापुड़ , बुलंदशहर , मेरठ को ) दिल्ली में शामिल किया जाएगा । हरियाणा के भी कुछ जिले दिल्ली में शामिल करके दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा । उत्तर प्रदेश और कुछ मध्यप्रदेश के जिलों को मिलाकर बुंदेलखंड बनेगा । हरियाणा में – मुजफ्फरनगर और सहारनपुर हरियाणा में शामिल होंगे ।

पूर्वांचल में में 6 मंडल और 23 जिले हैं । पूर्वांचल के जिले —(1) गोरखपुर मंडल — देवरिया , गोरखपुर , कुशीनगर , महाराजगंज । (2) आजमगढ़ मंडल — आजमगढ़ , बलिया , मऊ । (3) बस्ती मंडल — बस्ती , संतकबीरनगर , सिद्धार्थनगर । (4) देवीपाटन मंडल — बहराइच , गोंडा , बलरामपुर , श्रावस्ती ।(5) अयोध्या मंडल — अयोध्या , अंबेडकर नगर , सुल्तानपुर , अमेठी , बाराबंकी । (6) वाराणसी मंडल — चंदौली , गाजीपुर , जौनपुर , वाराणसी । पूरे 6 मंडल में 23 जिले हैं पूर्वांचल के उत्तर में नेपाल , पूरब में बिहार , झारखंड दक्षिण में छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश बुंदेलखंड और पश्चिम में उत्तर प्रदेश है । यह सबसे अधिक धनी आबादी वाला क्षेत्र है । यहां की मिट्टी कृषि के लिए अनुकूल है । यहां की प्रमुख भाषा भोजपुरी बोली जाती है । पूर्वांचल , उत्तर प्रदेशके सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है । इसकी वजह यह है कि यहां पर जाति आधारित राजनीति और एक बहुत बड़ी जनसंख्या है । पूर्वांचल में बुनियादी सुविधाओं की कमी , उचित ग्रामीण शिक्षा और रोजगार की कमी , कानून व्यवस्था में कमी है । पूर्वांचल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र है । यहां की धरती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , नेता , मंत्री , प्रधानमंत्री , डॉक्टर , इंजीनियर जैसे सपूतों की धरती है । भदोही , मिर्जापुर में कालीन निर्माता ; प्रयाग , वाराणसी , कुशीनगर में पर्यटन क्षेत्र ; बराणसी , सारनाथ साड़ी निर्माता ; सोनभद्र में बिजली उत्पादक क्षेत्र ; चूना , पत्थर की खदान क्षेत्र ; शिक्षा के क्षेत्र में भी पूर्वांचल अग्रणी है ।

प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण पूर्वांचल होने के बावजूद सबसे पिछडे़ क्षेत्रों में से एक हैं । जिसका मुख्य कारण राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा उचित ध्यान की कमी है । पूर्वांचल अपराध और भ्रष्टाचार के कारण अति पिछड़े क्षेत्रों में सम्मिलित है । जिसके कारण आम जनता के लिए पर्याप्त शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी है ।

पूर्वांचल के लोगों को ब्रिटिश शासकों ने अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक शोषण किया था । क्योंकि यहां के लोगों में मजबूत राष्ट्रवाद एवं देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी । और यहां के लोग गुलामी का ज्यादा विरोध करते थे । इसलिए यह क्षेत्र बहुत पिछड़ा हुआ है । अगर उत्तर प्रदेश को छोटे – छोटे टुकड़े में विभाजित कर अलग-अलग प्रदेश बना दिया जाए , तो पूर्वांचल का विकास निश्चित ही संभव हो सकेगा ।

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