सुहाग का व्रत है हरितालिका तीज

सुहाग का व्रत है हरितालिका तीज

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व है । इस दिन हरितालिका तीज मनाई जाती है । इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए किया था ।

हरतालिका तीज व्रत करने से महिलाओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है । श्रेष्ठ पति की कामना में कुंवारी कन्याएं और पति की लंबी आयु के लिए सौभाग्यवती स्त्रियां हरतालिका तीज का व्रत रखती है । लेकिन शास्त्र में इसके लिए सधवा- विधवा सबको आज्ञा है । धर्म परायण स्त्रियों को चाहिए कि वे ‘उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रतमहं करिष्ये’ संकल्प करके मकान को मंडल आदि से सुशोभित कर पूजा सामग्री एकत्र करें । इस दिन स्त्रियों को निराहार रहना होता है । संध्या समय स्नान करके शुद्ध व उज्जवल वस्त्र धारण करके पार्वती तथा शिव की स्वर्ण युक्त (यदि यह संभव न हो तो मिट्टी की ) प्रतिमा बनाकर पूजन की संपूर्ण सामग्री से पूजा करनी चाहिए ।

सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तुएं रखकर पार्वती जी को चढ़ाने का विधान इस व्रत का मुख्य उद्देश्य है । शिवजी को धोती तथा अंगोछा चढ़ाया जाता है । यह सुहाग सामग्री किसी ब्राह्मणी को तथा धोती अंगोछा ब्राह्मण को दे दें । तत्पश्चात 13 प्रकार के मीठे व्यंजन सजाकर रूपयों सहित सासु को देकर उनका चरण स्पर्श करें । इस प्रकार पार्वती तथा शिव का पूजन आराधना करके कथा सुननी चाहिए ।

इस व्रत को करने से स्त्रियों को सौभाग्य प्राप्त होता है । जो स्त्रियां इस व्रत को रखकर भोजन कर लेती है, वह जन्म जन्मांतर विधवा तथा सात जन्म तक बांझ होने का अपार कष्ट झेलती हैं । व्रत न करने वाली अथवा करके छोड़ देने वाली स्त्री भी नरक की अधिकारिणी बनती है ।

पूजनोपरांत स्वर्ण अथवा रजत के बर्तनों में ब्राह्मणों को मधुर भोजन कराकर ही इस व्रत का पारण करना चाहिए । स्त्रियां भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा -अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं । इस व्रत को रखने वाली महिलाएं और लड़कियां तृतीया तिथि से पहले ही सरगी कर लें या ब्रह्म मुहुर्त से पूर्व सरगी कर लें । सरगी यानी व्रत लेने की प्रक्रिया । यह व्रत ककड़ी के सेवन से लिया जाता है और ककड़ी के सेवन से ही खोला जाता है ।

मान्यताओं के अनुसार जिन लड़कियों के विवाह में देरी होती है , इस व्रत को करने से उन्हें माता पार्वती की विशेष कृपा मिलती है । उनके विवाह में आने वाली रुकावटें दूर होती है ‌। हरतालिका तीज व्रत निराहार और निर्जला किया जाता है ।

हरतालिका व्रत की पौराणिक कथा

यह पवित्र कथा महादेव ने ही मां पार्वती को सुनाई थी । शिव भगवान ने इस कथा में मां पार्वती को उनका पिछला जन्म याद दिलाया था । “हे गौरा , पिछले जन्म में तुमने मुझे पाने के लिए बहुत छोटी उम्र में कठोर तप और घोर तपस्या की थी । तुमने न तो कुछ खाया और न ही पीया । सिर्फ हवा और सूखे पत्ते चबाएं । जला देने वाली गर्मी हो या कंपा देने वाली ठंड में भी तुम दृढ़ रही । बारिश में भी तुमने जल नहीं पिया । तुम्हें इस हालत में देखकर तुम्हारे पिता दु:खी थे । उनको दु:खी देखकर नारद मुनि आए और कहा कि मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां आया हूं । वह आपकी कन्या से विवाह करना चाहते हैं । इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं । नारद जी की बात सुनकर आपके पिता बोले अगर भगवान विष्णु यह चाहते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है । परंतु जब तुम्हें इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम दु:खी हो गयी । तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दु:ख का कारण पूछा तो तुमने कहा कि मैंने सच्चे मन से भगवान शिव का वरण किया है । किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णु जी के साथ तय कर दिया है । मैं विचित्र धर्म संकट में हूं । अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा है । तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी । उसने कहा प्राण छोड़ने का यहां कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिए ।

नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया , जीवन पर्यंत उसी से निर्वाह करें । मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूं जो साधना स्थल भी है और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी नहीं पाएंगे । मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे । तुमने ऐसा ही किया । तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर बड़े चिंतित और दु:खी हुए ।

इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगी । तुम रेत के शिवलिंग का निर्माण किया । तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुंचा और तुम से वर मांगने को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूं । यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए । तब तथास्तु कह कर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया । उसी समय गिरिराज अपने बन्धु-बान्धवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहां पहुंचे । तुमने सारा वृत्तांत बताया और कहा कि मैं घर तभी जाऊंगी अगर आप महादेव से मेरा विवाह करेंगे । तुम्हारे पिता मान गये और उन्होंने हमारा विवाह करवाया । इस व्रत का महत्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मनवांछित फल देता हूं । इस पूरे प्रकरण में तुम्हारी सखी ने तुम्हारा हरण किया था , इसलिए इस व्रत का नाम हरितालिका व्रत हो गया ।

भगवान शिव ने कहा इस व्रत को हरितालिका तीज इसलिए कहते हैं कि पार्वती की सखी उसे पिता के प्रदेश से हरकर घनघोर जंगल में ले गई थी । ‘हरत’ अर्थात हरण करना और ‘आलिका ‘ अर्थात सखी, सहेली । इसे ‘बूढ़ी’ तीज भी कहा जाता है । इस दिन सासुएं बहुओं को सुहागी का सिंधारा देती हैं । बहुएं पांव छू कर सासु को रुपए देती हैं ।

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