चारों धाम की यात्रा

चारों धाम की यात्रा

जीवन में यात्रा का जो रोमांच है, वह यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसी यात्राओं पर जाकर ही महसूस किया जा सकता है ।

चारों धाम की यात्रा की शुरुआत यमराज की बहन यमुनोत्री की यात्रा से होती है । यह यात्रा इतनी दुर्गम है कि यमुनोत्री की यमराज की बहन होने का नाम सार्थक होता सा लगता है । इस यात्रा में जाने पर आप अपनी मौत के साक्षात दर्शन कर सकते हैं । और इस मौत का मुकाबला करने में आपके अंदर गजब की शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा पैदा होती है। जिसका प्रत्यक्ष अनुभव आप यहां जाने के बाद ही कर सकते हैं ।

(1) यमुनोत्री की यात्रा

उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से 3235 मीटर ऊंचाई पर स्थित एक मंदिर है । यह मंदिर देवी यमुना का मंदिर है । चारों धामों में से एक धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है । यहां बंदरपुंछ चोटी (6315मी) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर का भव्य रूप देखने को मिलता है । यमुना नदी कालिंदी पर्वत से निकलती है । यहां पर सूर्य कुंड भी है , जिसमें गर्म पानी का सोता- सा बहता है । इस कुंड के जल का तापमान 80 डिग्री सेल्सियस तक होता है । यहां आने वाले श्रद्धालु प्रसाद के रूप में चढ़ाने के लिए कपड़े की पोटली में चावल- आलू बांधकर इसी कुंड के गर्म जल में पकाते हैं । प्रसाद चढ़ाने के बाद सभी यह पके चावल प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं । यमुना के मंदिर प्रांगण में एक विशाल स्तंभ बना हुआ है, जिसे दिव्य शिला के नाम से जाना जाता है । ठंड के दिनों में यहां चारों तरफ बर्फ छाई रहती है । बस या कार से आप हनुमान चट्टी (चट्टी का मतलब होता है ठहरने के लिए बने विश्राम स्थल) तक ही जा सकते हैं , जो ऋषिकेश से 200 किलोमीटर की दूरी पर है । यहां से 8 किलोमीटर की चढ़ाई पैदल चलकर अथवा टट्टुओं पर सवार होकर तय करनी पड़ती है । यहां से तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए किराए पर पालकी तथा कुली भी आसानी से उपलब्ध रहते हैं । यमुना माता के मंदिर का निर्माण , टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह ने करवाया था । यमुनोत्री मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया (अप्रैल – मई ) में खुलते हैं । और वे दीपावली (अक्टूबर-नवंबर) के आस पास बंद हो जाते हैं ।

(2) गंगोत्री की यात्रा

कहते हैं कि एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ करने की दीक्षा ली । अश्वमेघ का श्याम कर्ण घोड़ा छोड़ दिया गया और उसके पीछे-पीछे राजा सगर के साठ हजार पुत्र अपनी विशाल सेना के साथ चलने लगे । सगर के इस अश्वमेघ से भयभीत होकर देवराज इंद्र ने अवसर पाकर उस घोड़े को चुरा लिया । और उसे ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया । उस समय कपिल मुनि ध्यान में लीन थे । अत: उन्हें इस बात का पता ही न चला । इधर सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े को पृथ्वी के कोने कोने में खोजते रहे । जब सगर के पुत्रों ने वह घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम में बंधा हुआ देखा । तो यह समझकर की घोड़े को कपिल मुनि ही चुरा लाए हैं । उन्होंने कपिल मुनि को अपमानित किया । इस पर कुपित होकर कपिल मुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को अपने क्रोधाग्नि से भस्म कर दिया ।

इसके बाद राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान (कई कथाओं में अंशुमान को राजा सगर की दूसरी रानी का पुत्र भी बताया गया है ।) को कपिल मुनि के पास भेजा । और अंशुमान ने कपिल मुनि को प्रसन्न कर लिया ।कपिल मुनि ने प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने को कहा । अंशुमान ने अपने पूर्वजों के उद्धार का उपाय पूछा । इस पर कपिल मुनि ने घोड़ा लौटाते हुए कहा,”वत्स, तुम्हारे दादाओं का उद्धार केवल गंगा के जल के तर्पण करने पर ही हो सकता है ।” अंशुमान ने यज्ञ का अश्व लाकर सगर का अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करा दिया । यज्ञ पूर्ण होने पर राजा सगर ने अंशुमान को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए उत्तराखंड चले गए । इस प्रकार तपस्या करते- करते उनका स्वर्गवास हो गया । अंशुमान के पुत्र का नाम दिलीप था । दिलीप के बड़े होने पर अंशुमान ने भी दिलीप को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए उत्तराखंड चले गए । लेकिन वह भी गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल न हो सके ।

दिलीप के पुत्र का नाम भागीरथ था । भागीरथ के बड़े होने पर दिलीप ने अपने पूर्वजों का अनुगमन किया । लेकिन गंगा को पृथ्वी पर लाने में उन्हें भी सफलता नहीं मिली । अन्तत: भगीरथ ने एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की । तो उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी ने वरदान मांगने के लिए कहा । भगीरथ ने कहा , “मेरे साठ हजार पुरखों के उद्धार के लिए पृथ्वी पर अवतार लें ।” इस पर गंगा ने कहा, ” वत्स ! मैं तुम्हारी बात मान कर पृथ्वी पर आऊंगी , लेकिन मेरे वेग को शंकर भगवान के अतिरिक्त और कोई सहन नहीं कर सकता । इसलिए तुम पहले शंकर भगवान को प्रसन्न करो ।” यह सुनकर भगीरथ ने शंकर भगवान की घोर तपस्या की । और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी हिमालय के शिखर पर गंगा के वेग को रोकने के लिए खड़े हो गए । गंगा स्वर्ग से सीधे शिवजी की जटाओं पर जा गिरीं । इसके बाद भगीरथ ने गंगा को अपने पीछे- पीछे अपने पूर्वजों के अस्थियों तक ले आये, जिससे उनका उद्धार हो गया । भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार करके गंगा जी सागर में जा गिरी और अगस्त्य मुनि द्वारा सोखे हुए समुद्र में फिर से जल भर दिया ।

(3) केदारनाथ की यात्रा

गंगोत्री के बाद हम पहुंचते हैं समुद्र तल से 14000 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ मंदिर में । केदारनाथ के निकट ही गांधी सरोवर और वासुकी ताल है । केदारनाथ पहुंचने के लिए रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, 20 किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक , बस या कार से 14 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है । पूरा मार्ग घाटियां ढलान और ऊंची- ऊंची चढ़ाईयों की वजह से बेहद खतरनाक सा लगता है । चौरीबारी हिमनद के कुण्ड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर पर निर्मित केदारनाथ मंदिर 1000 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है ।

(4) बद्री विशाल की यात्रा

बद्री विशाल पहुंचने के लिए तीन ओर से रास्ते हैं । रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल ) से और हरिद्वार होकर देवप्रयाग से । ये तीनों रास्ते रुद्रप्रयाग में मिल जाते हैं । रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी और अलकनंदा का संगम है । जहां दो नदियां मिलती है उस जगह को प्रयाग कहते हैं । बद्री-केदार की राह में कई प्रयाग आते हैं । रुद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ तक जाना चाहते हैं , वे उधर चले जाते हैं । बद्रीनाथ हिंदुओं के चार धामों में से एक है । कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य जब वह यहां पहुंचे तो उन्हें सुष्मांद-गंधमदना पहाड़ियों पर अद्भुत हवा का एहसास हुआ । उससे प्रभावित होकर शंकराचार्य ने अष्टपदी का पारायण किया । कल-कल बहती अलकनंदा नदी के किनारे वह बद्रीनाथ के पुण्य प्रतिमाएं ढूंढने लगे । तभी उन्हें नारदशिला और वराहशिला दोनों के बीच नारद कुंड मिला । इसी पानी के अंदर उन्हें बद्रीनाथ की अदृश्य मूर्ति मिली । इसी तरह दूसरी बार कुंड में उन्हें दूसरी प्रतिमा मिली । जब तीसरी बार डुबकी लगाई तो तीसरी मूर्ति मिली । उनके हाथ में तीसरी मूर्ति आते ही एक आवाज सुनाई दी । यह जो मूर्ति तुम्हारे हाथ में है इसे ब्रह्मा जी ने प्रतिष्ठित किया था । इसे इसकी सही जगह पर पहुंचाओ ।

इस कथा के अनुसार 2500 साल पहले आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ की इस प्रतिमा की स्थापना की थी । दो शताब्दियों पूर्व गढ़वाल के राजाओं ने बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था । मंदिर के गर्भगृह में बद्रीनारायण , धन के भगवान कुबेर , नारद मुनि , उथावर , नर-नारायण , महालक्ष्मी , गरुड़ , स्वामी देसीकन , रामानुज और आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित है । बद्रीनारायण की मुख्य प्रतिमा काले पत्थर से बनी है । जिसके हाथों में शंख-चक्र है और जो योग मुद्रा में बैठे हैं । गर्भगृह के साथ ही मंदिर में दर्शन मंडप और सभा मंडप है । इसके कपाट 6 महीने के लिए खुलते हैं । हिंदू कैलेंडर के अनुसार बैसाख से कार्तिक तक बद्रीनाथ के पट खुलते हैं । मार्गशीर्ष से चैत्र तक पट लोगों के दर्शन के लिए बंद रहते हैं । मान्यता है कि मार्गशीर्ष से चैत्र के बीच देवगण भगवान बद्रीनाथ के दर्शन के लिए यहां आते हैं । सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ की कांसे की बनी प्रतिमा पांडुकेश्वर ले जाया जाता है । यही जगह सर्दियों में भगवान का निवास होता है ।

सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जब बद्रीनाथ के कपाट बंद किए जाते हैं तो उसमें एक दीपक जलता रहता है । छ: महीने बाद जब ये कपाट वापस खोले जाते हैं तो ये दीपक वैसा ही जलता हुआ दिखाई देता है । पूरी यात्रा के दौरान एक बात बार-बार महसूस होती है कि गंगा और यमुना में जल का स्तर तेजी से घट रहा है । यहां अगर बांध बनाकर पानी नहीं रोका गया तो आने वाले समय में मैदानी क्षेत्रों में इन नदियों में शायद ही पानी देखने को मिले । यात्रा के दौरान हम पल-पल कष्टों और मुसीबतों के बीच रहकर जिस स्वर्णिक आनंद की अनुभूति करते हैं , उसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है ।

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