चमत्कारी नीलकंठ महादेव का प्राचीन शिव मंदिर (गोरखपुर)

चमत्कारी नीलकंठ महादेव का प्राचीन शिव मंदिर (गोरखपुर)

यह नीलकंठ महादेव का प्राचीन शिव मंदिर , पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के गोरखपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर खजनी कस्बे के सरया तिवारी गांव में स्थित है

मंदिर के पुजारी आचार्य अतुल त्रिपाठी बताते हैं कि यह शिवलिंग हजारों साल पुराना है ।चमत्कारी नीलकंठ महादेव मंदिर के इस शिव लिंग को नीलकंठ महादेव के नाम से जाना जाता है । मान्यता है कि यह शिवलिंग भू – गर्भ से स्वयं प्रकट हुआ था । यानि यह प्राकृतिक (स्वयं लिंगी) , शिवलिंग है । यह शिवलिंग इतना विशाल शिवलिंग है कि पूरे भारत में सिर्फ एक है , और यहीं पर स्थित है ।

इस शिव मंदिर के चमत्कार की कहानी यह है कि इस प्राचीन शिवलिंग को हिंदू पूजा करते हैं और मुस्लिम इबादत करते हैं । कहा जाता है कि पूरे देश में बगैर योनि (थाली) का यह पहला शिवलिंग है । वैसे तो श्रद्धालुओं की भीड़ हमेशा रहती है , लेकिन श्रावण महीना में यहां दूर-दूर से और देश – विदेश से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं । और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए हिन्दू श्रद्धालु शिवजी से मन्नतें मांगते हैं । यहां हिंदू श्रद्धालु आकर श्रद्धा और विश्वास के साथ सिर झुका कर भोलेनाथ का आशीर्वाद मांगते हैं । तो भगवान नीलकंठ महादेव जरूर उसकी मनोकामना पूर्ण करते हैं ।

इस शिव मंदिर के पास ही एक तालाब है । यहां खुदाई में लगभग 10 – 10 फीट के नर- कंकाल , हड्डियां और दांत मिल चुका है । जो पुराने समय में इस मंदिर के साथ हुए क्रूरता को बताते हैं । जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया तो पूरे देश के मंदिरों को लूटता और तबाह करता हुआ इस गांव में आया । तो उसने और उसकी सेना ने इस प्राकृतिक शिवलिंग के बारे में सुनकर उस मंदिर के तरफ आया । उसने महादेव के इस मंदिर को गिरा दिया इसके बाद शिवलिंग को उखाड़ने की कोशिश किया । जिससे उसके नीचे छिपे खजाने को निकाल सके । उसने जितनी गहराई तक खोदता गया , शिवलिंग उतना ही बढ़ता गया । जितने बार शिवलिंग को वार करके नष्ट करने की कोशिश करता था, हर बार शिवलिंग से रक्त की धारा निकल पड़ती थी । इसके बाद गजनवी के साथ आए हुए मुस्लिम धर्मगुरुओं ने महमूद गजनवी को सलाह दिये कि इस शिवलिंग को कुछ नहीं कर पाओगे । क्योंकि इसमें ईश्वर की शक्ति विराजमान है । महमूद गजनवी को ईश्वरीय शक्ति के आगे झुकना पड़ा । और यहां से वापस जाने में ही अपनी भलाई समझा । जब क्रूर शासक महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया था तो यह शिव मंदिर भी उसके क्रूर हाथों से नहीं बच पाया था । और उसने शिव मंदिर को ध्वस्त कर दिया था । लेकिन शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ ।

जब गजनवी थक हार गया तो उसने शिवलिंग पर कलमा खुदवा दिया , ताकि हिंदू पूजा न कर सकें । शिवलिंग को तोड़ने में कामयाब नहीं हो सका तो उसने शिवलिंग के ऊपर अरबी जुबान में “ला इलाह इला अल्लाह मुहम्मद उर रसूल अल्लाह ” लिखवा दिया । महमूद गजनवी यह सोचकर ऐसा लिखवाया कि कलमा लिखवाने से कोई भी हिंदू इस शिवलिंग की पूजा नहीं करेगा । गजनवी के आक्रमण के सैकड़ों साल बाद भी हिंदुओं की , मंदिर पर श्रद्धा और विश्वास विद्यमान है । महमूद गजनवी ने भारत पर एक – दो बार नहीं 17 बार आक्रमण किया था । उसने हिंदुस्तान को जी भर कर लूटा और मंदिरों को ध्वस्त करता चला गया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का यह शिव मंदिर सदियों से क्रूरता की दास्तान बताता है ।

महमूद गजनवी तो चला गया, लेकिन गोरखपुर के इस मंदिर का शिवलिंग नहीं तोड़ पाया । जब शिवलिंग नहीं टूटा तो उस पर कलमा खुदवा दिया ताकि हिंदू यहां पर पूजा न करें । केवल मुस्लिम इबादत करें । लेकिन हिंदुओं की आस्था सैकड़ों साल बाद भी बरकरार है । शिवभक्त आज भी यहां पूजा – पाठ के साथ-साथ जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करते हैं और चंदन का लेप लगाते हैं ।

स्थानीय निवासी धरणीधर राम त्रिपाठी बताते हैं कि महमूद गजनवी और उसके सेनापति बख्तियार खिलजी ने इस शिव मंदिर को नष्ट किया था । इस मंदिर पर छत नहीं लग पाती है । कई बार इस पर छत लगाने की कोशिश की गई, लेकिन वह छत हर बार गिर जाती है । यहां विदेशों से भी लोग दर्शन करने के लिए आते हैं । यहां के श्रद्धालु बताते हैं कि देश और विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए भगवान नीलकंठ महादेव में विशेष आस्था होती है ।

यहां पर शिव मंदिर के बगल में एक पोखरा है । कहा जाता है कि इस पोखरे के जल को छूने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है । यहां पर कुष्ठ रोग से पीड़ित एक राजा आए और पानी को कुष्ठ रोग पर लगाने से उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया । तभी से लोग चर्म रोगों से मुक्ति पाने के लिए यहां पांच मंगलवार और रविवार आकर स्नान करते हैं । और चर्म रोगों से मुक्ति पाते हैं ।

यहां मंदिरों के आसपास के टीलों की खुदाई में 10 से 12 फुट लंबी नर कंकाल मिले थे । इसके साथ ही 18 फीट के कई भाले और दूसरे हथियार भी मिले थे । यहां की शिवलिंग खुले आसमान के नीचे रहता है । बहुत कोशिशों के बाद भी यहां मंदिर की छत नहीं लग पायी । नीलकंठ महादेव का मंदिर पुराने समय से ही हिंदुओं के धार्मिक महत्व और आस्था का विशेष केंद्र रहा है ।

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