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उपवन के फूलों ने फिर प्रश्न ये उछाले हैं

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उपवन के फूलों ने प्रश्न ये उछाले हैं.
किसने ये तितली के पंख नोच डाले हैं.

कल तक तो गंधों पर गैरों का पहरा था.
बैरी के पंजो का घाव बहुत गहरा था.
तितली तो घावों को सहलाने आयी थी.
पंखों से पीड़ा को बहलाने आयी थी.
बैरी का मीत कोई, बगिया में बैठा था.
बैर पुराने जिसने आज फिर निकाले हैं.
किसने ये तितली के पंख नोच डाले हैं.

तुम में से कौन जिसे रंग नहीं भाते हैं .
तुम में से कौन जिसे फूल न सुहाते हैं.
इन्द्रधनुषी पंखों का चीत्कार जिन्दा है.
सर क्यूँ न माली का फिर भी शर्मिंदा है.
बोलो तुम ही अब चुप सी क्यूँ साधी है.
आँखों पर परदे क्यूँ, होठो पर ताले हैं.
उपवन के फूलों ने प्रश्न ये उछाले हैं.

किसने ये तितली के पंख नोच डाले हैं.
उपवन के फूलों ने फिर प्रश्न ये उछाले हैं.

—राजेंद्र