तप की नगरी तीर्थराज प्रयाग

तप की नगरी तीर्थराज प्रयाग

हिंदू मान्यता के अनुसार यहां सृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि का कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था । इसी प्रथम यज्ञ के प्रथम से ( प्र) और यज्ञ से ( याग) निकाल कर जोड़ा गया , तो प्र + याग= प्रयाग बना है । उस यज्ञ वाले स्थान का नाम प्रयाग रखा गया , जहां पर भगवान ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ संपन्न किया था ।

प्रयाग का अर्थ —प्र का अर्थ होता है बहुत बड़ा (प्रथम ) तथा याग का अर्थ होता है यज्ञ ।

” प्रकृष्टो यज्ञो अभूद्यत्र तदैव प्रयाग: । “

यानि वह स्थान , जहां पहला यज्ञ हुआ था । इस प्रकार इसका नाम ‘प्रयाग ‘ पड़ा ।

दूसरा — वह स्थान जहां बहुत से यज्ञ हुआ हो । एक बार पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान ब्रह्मा ने यहां पर सर्वप्रथम एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था । इस यज्ञ में ब्रह्मा जी स्वयं पुरोहित , भगवान विष्णु यजमान एवं भगवान शिव उस यज्ञ के देवता बने थे । तब अंत में तीनों देवताओं ने अपनी शक्तिपुंज के द्वारा पृथ्वी के पाप बोझ को हल्का करने के लिए एक ‘ वृक्ष’ उत्पन्न किया । यह एक बरगद का ‘वृक्ष’ था , जिसे आज अक्षय वट के नाम से जाना जाता है । यह आज भी विद्यमान है । अक्षयवट अमर है । औरंगजेब ने इस वृक्ष को नष्ट करने का बहुत प्रयास किया । इसे खुदवाया , जलवाया और इसकी जड़ों में तेजाब तक डलवाया । किंतु वर ( शक्ति प्राप्त )अक्षयवट आज भी विराजमान है । आज भी औरंगजेब के द्वारा जलाए जाने के निशान देखे जा सकते हैं ।

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसकी विचित्रता से प्रभावित होकर अपने संस्करण में इसका उल्लेख किया है ।

प्रयागराज उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जनपद है । यह स्थान गंगा , यमुना और गुप्त सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है ।

शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि —

” रे वा तीरे तप: कुर्यात मरणम् जाह्नवी तटे ।”

अर्थात तपस्या करना हो तो नर्मदा नदी के तट पर और शरीर त्यागना हो तो गंगा तट पर जायें ।

गंगा के तट पर प्रयाग , हरिद्वार , काशी आदि तीर्थ बसे हुए हैं । उसमें प्रयागराज का बहुत महत्व है । इस प्रयागराज को बहुत सुरक्षित होने के कारण ही रावण जैसा बलशाली भी , समस्त प्रयाग क्षेत्र के पास भटक नहीं सका था । उसने कैलाश पर जाने के लिए बहुत घूम कर अंग – उड़ीसा , बंग – बंगाल एवं श्याम देश होकर रास्ता अपनाया । सीधे काशी , प्रयाग एवं अयोध्या आदि का रास्ता नहीं अपनाया ।

इसी परम पावन स्थल पर देवताओं ने मिलकर तप एवं सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए आराधना की थी । सूर्य देव प्रसन्न हुए , तथा उन्होंने वरदान दिया कि मेरे अपने पुत्र के घर में अर्थात मकर एवं कुंभ राशि में रहते जो भी व्यक्ति इस अति पवित्र संगम स्थल पर मेरी आराधना करेगा , उसे कभी कोई कष्ट अथवा व्याधि (रोग ) नहीं सताएगी ।

गंगा , यमुना , एवं गुप्त सरस्वती के संगम स्थान को त्रिवेणी कहा जाता है । यह दुर्लभ संगम विश्व प्रसिद्ध है । यह स्थान हिंदुओं के लिए विशेषकर पवित्र स्थल है । प्रयाग में आर्यों की प्रारंभिक बस्तियां स्थापित हुई थी ।

” प्रयागस्य प्रवेशाद्वै पापम् नश्यति: तत्क्षणात् ।”

अर्थात प्रयाग में प्रवेश मात्र से ही समस्त पाप कर्म का नाश हो जाता है ।

प्रयाग अपने गौरवशाली अतीत एवं वर्तमान के साथ भारत के ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगरों में से एक है । यह हिंदू , मुस्लिम , सिक्ख , जैन एवं ईसाई समुदायों की मिश्रित संस्कृति का शहर है । इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहां माधव रूप में विराजमान है । भगवान के यहां 12 स्वरूप विद्यमान है , जिन्हें द्वादश माधव कहा जाता है । सबसे बड़े हिंदू सम्मेलन महाकुंभ की 4 स्थलियों में से एक है , शेष तीन हरिद्वार , उज्जैन एवं नाशिक है ।

हिंदू धर्म के ग्रंथों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रम् नदी गंगा , यमुना और गुप्त सरस्वती नदी के संगम पर स्थित है । इसे त्रिवेणी संगम के नाम से भी पुकारा जाता है । जहां प्रत्येक 12 वर्ष में महाकुंभ मेला लगता है , जहां श्रद्धालुओं की संख्या करोड़ों में होती है । प्रयाग सोम , वरुण , प्रजापति की जन्मस्थली है । ऋषि भारद्वाज , दुर्वासा , पन्ना की ज्ञान स्थली थी । विश्व के महान दार्शनिक भारद्वाज ऋषि , यहां लगभग 500 ईसवी पूर्व में निवास करके 10,000 से अधिक शिष्यों को पढ़ाया था संगम के करीब में झूंसी क्षेत्र , चंद्र वंश के वंशज राजा पुरुरव का राज्य था । कौशांबी क्षेत्र , वत्स और मौर्य शासन के दौरान समृद्धि रूप से उभर रहा था ।

इस देव भूमि का प्राचीन नाम प्रयाग ही था , लेकिन जब मुस्लिम शासक अकबर यहां आया और उसने इस जगह के हिन्दू महत्व को समझा । तो उसने इसका नाम 1583 में बदलकर ‘अल्लाह का शहर ‘ रख दिया । मुगल बादशाह अकबर के राज इतिहासकार और अकबरनामा के रचयिता अबुल फजल बिन मुबारक ने लिखा है कि 1583 में अकबर ने प्रयाग में एक बड़ा शहर बसाया और संगम की अहमियत को समझते हुए इसे ‘अल्लाह का शहर’ इल्लाहावास नाम दे दिया ।

जब हिंदुस्तान पर अंग्रेज शासन करने लगे तो रोमन लिपि में इसे ‘अलाहाबाद’ लिखा जाने लगा । जो बाद में बिगड़ कर इलाहाबाद हो गया । परंतु इस संबंध में एक मान्यता यह भी है कि ‘इला’ नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर थी , के वास कारण इस स्थान का नाम ‘इलावास’ पड़ा, जो अब झूंसी है । कालांतर में इसके नाम का उच्चारण अंग्रेजों ने इलाहाबाद कर दिया । हालांकि यह भी कहा जाता है कि अकबर ने हिंदू एवं मुस्लिम दोनों धर्मों को मिलाकर एक नया धर्म चलाया था । जिसका नाम उसने ‘दीन ए इलाही’ रखा । कहते हैं कि इस प्रकार इलाही जहां पर आबाद हुआ वह इलाहाबाद कहलाया । तभी से प्रयाग को इलाहाबाद कहा जाता है ।

इस समय उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्राचीन नाम प्रयागराज कर दिया है । सभ्यता के प्रारंभ से ही प्रयागराज विद्या , ज्ञान और लेखन का गढ़ रहा है । यह भारत का सबसे जीवन्त , राजनीतिक तथा आध्यात्मिक रूप से जागरूक शहर रहा है ।

वेद में प्रयाग का महत्व —-

सितासिते सरिते यत्र संगते तत्राअप्लुप्त असो दिवमुत्पन्ति ।
ये वै तन्वम् विसृजन्ति घोरास्ते जनाअसो अमृतत्वम् भजन्ते ।।

जिनके जल श्वेत और श्याम वर्ण के हैं , जहां गंगा और यमुना मिलती है , उस प्रयाग संगम में स्नान करने वालों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है । और धीर पुरुष वहां शरीर त्याग करते हैं , उन्हें अमृतत्व और मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

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