महाभारत की कथा एवं बुद्ध आदि अवतारों की कथा का वर्णन

महाभारत की कथा एवं बुद्ध आदि अवतारों की कथा का वर्णन

ब्रह्मा जी ने कहा कि अब मैं महाभारत के युद्ध की कथा का वर्णन करूंगा , जो पृथ्वी पर बढ़े हुए अत्याचार के भार को उतारने के लिए हुआ था । जिसकी योजना युधिष्ठिर आदि पांडवों की रक्षा के लिए तत्पर श्रीकृष्ण ने स्वयं की थी ।

भगवान विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई ब्रह्मा से अत्रि , अत्रि से सोम , सोम से बुध हुए । बुध ने इला नामक अपनी पत्नी से पुरूरवा को उत्पन्न किया । पुरुरवा से आयु , आयु से ययाति और ययाति के वंश में भरत , कुरू , तथा शन्तनु हुए । राजा शन्तनु की पत्नी गंगा से भीष्म हुए

भीष्म सर्वगुण संपन्न तथा ब्रह्म विद्या के पारंगत विद्वान थे । शंतनु की सत्यवती नामक एक दूसरी पत्नी थी । उस पत्नी के दो पुत्र हुए , जिनका नाम चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य था । चित्रांगद नाम वाले गंधर्व के द्वारा युद्ध में चित्रांगद मार डाला गया । विचित्रवीर्य का विवाह काशीराज की पुत्री अंबिका और अंबालिका के साथ हुआ । विचित्रवीर्य भी नि:संतान ही मर गए थे । अत: व्यास से उनके दो क्षेत्रज पुत्रों , अंबिका के गर्भ से धृतराष्ट्र तथा अंबालिका के गर्भ से पांडु का जन्म हुआ । उन्हीं व्यास के द्वारा दासी के गर्भ से विदुर का जन्म हुआ । धृतराष्ट्र के गांधारी से सौ पराक्रमी पुत्र हुए , जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था । पांडुपत्नी कुन्ती और माद्री से पांच पुत्रों का जन्म हुआ । युधिष्ठिर , भीमसेन , अर्जुन , नकुल तथा सहदेव । ये पांचों पुत्र बड़े ही बलवान और पराक्रमशाली थे । दैववशात कौरव और पांडवों में वैरभाव उत्पन्न हो गया ।

उद्धत स्वभाव वाले दुर्योधन द्वारा पांडव जन बहुत ही सताए गए । लाक्षागृह में उन्हें विश्वासघात से जलाया गया , किंतु वे अपनी बुद्धिमत्ता से बच गए । उसके बाद उन लोगों ने एकचक्रा नामक पुरी में जाकर एक ब्राह्मण के घर में शरण ली । वहां रहते हुए उन सभी ने बक नामक राक्षस का संहार किया । तदनन्तर पांचाल नगर में हो रहे द्रोपती के स्वयंवर को जानकर वे सभी वहां पहुंच गये । वहां अपने पराक्रम का परिचय देकर उन पांडवों ने द्रौपति को पत्नी के रूप में प्राप्त किया । इसके बाद द्रोणाचार्य और भीष्म की अनुमति से धृतराष्ट्र ने पांडवों को अपने पास बुला लिया और आधा राज्य उन्हें दे दिया ।

आधा राज्य प्राप्त करने के पश्चात इंद्रप्रस्थ नामक एक सुंदर नगरी में रहकर वे राज्य करने लगे । उन तपस्वी पांडवों ने वहां पर एक सभा मंडप का निर्माण कर के राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया । तत्पश्चात मुरारी भगवान वासुदेव की अनुमति से ही द्वारिका पुरी में जाकर अर्जुन ने उनकी बहन सुभद्रा का पाणिग्रहण किया । उन्हें अग्निदेव से नंदीघोष नामक दिव्य रथ , तीनों लोकों में प्रसिद्ध गांडीव नाम का श्रेष्ठतम दिव्य धनुष , अविनाशी बाण तथा अभेद्य कवच प्राप्त हुआ । उसी धनुष से कृष्ण के सहचर वीर अर्जुन ने अग्नि को खांडव वन में संतुष्ट किया था । दिग्विजय में देश देशांतर के राजाओं को जीतकर उनसे प्राप्त रत्नराशि लाकर उन्होंने अपने नीति परायण ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर को सौंप दी ।

भाइयों के साथ धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण , दुशासन और शकुनि के मत में स्थित पापी दुर्योधन के द्वारा द्यूतक्रीड़ा के मायाजाल में जीत लिए गए । उसके बाद 12 वर्षों तक उन्हें वन में महान कष्ट उठाना पड़ा । तदनन्तर धौम्य ऋषि तथा अन्य मुनियों के साथ द्रोपती सहित पांचों पांडव विराट नगर गये और गुप्त रूप से वहां रहने लगे । एक वर्ष तक वहां रहकर दुर्योधन द्वारा हरण की जाती हुई गायों का प्रत्याहरण करके अर्थात वापस लौटाकर वे अपने राज्य में जा पहुंचे ।

सम्मान पूर्वक दुर्योधन से उन्होंने अपने आधे राज्य के हिस्से के रूप में पांच गांव मांगे । किंतु दुर्योधन से वे भी प्राप्त न हो सके । अत: कुरूक्षेत्र के मैदान में उन वीरों को युद्ध करना पड़ा । उसमें पांडवों की ओर सात दिव्य अक्षौहिणी सेना थी और दुर्योधनादि ग्यारह अक्षौहिणी सेना से युक्त थे । ये युद्ध देवासुर संग्राम के समान महा भयंकर हुआ था । सबसे पहले दुर्योधन की सेना के सेनापति भीष्म हुए और पांडवों का सेनापति शिखण्डी बना । उन दोनों के बीच में शस्त्र-से-शस्त्र और बाण- से-बाण भिड़ गए । दस दिनों तक महा भयंकर युद्ध होता रहा । शिखंडी और अर्जुन के सैकड़ों बाणों से बिंधकर भीष्म धराशायी हो गए , किंतु इच्छामृत्यु का वरदान होने से भीष्म की उस समय मृत्यु नहीं हुई । जब सूर्य उत्तरायण में आ गए तब धर्म संबंधित विचित्र उपदेश देकर उन्होंने अपने पितरों का तर्पण किया और भगवान गदाधर का ध्यान करते हुए अंत में वे उस परम पद को प्राप्त हुए , जहां पर आनंद ही आनंद है और जो निर्मल आत्माओं के लिए मुक्ति का स्थान है

तदनन्तर सेनापति के पद पर द्रोणाचार्य आसीन हुए । उनका युद्ध पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न के साथ हुआ । यह परम दारूण युद्ध पांच दिनों तक चलता रहा । जितने भी राजा इस युद्ध में सम्मिलित हुए , वे सभी अर्जुन के द्वारा मारे गए । पुत्रशोक का समाचार सुनकर द्रोणाचार्य उस शोक के सागर में डूब कर मर गए । इसके बाद वीर अर्जुन से लड़ने के लिए कर्ण युद्ध भूमि में आया । दो दिनों तक महा भयानक युद्ध करके वह भी उनके द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों से न बच सका ।

तत्पश्चात शल्य धर्मराज से युद्ध करने के लिए गया । अपराह्न काल होने के पूर्व ही धर्मराज के तीक्ष्ण बाणों से वह भी चल बसा । तदनन्तर कालान्तक यमराज के समान क्रुद्ध दुर्योधन गदा लेकर भीमसेन को मारने के लिए दौड़ा , किन्तु वीर भीमसेन ने अपनी गदा से उसे गिरा दिया । उसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने रात्रि में सोई हुई पांडवों की सेना पर आक्रमण कर दिया । अपने पिता के वध का स्मरण करके उसने बड़ी ही बहादुरी से बहुतों को मौत के घाट उतार दिया । धृष्टद्युम्न का वध करके उसने द्रोपती के पुत्रों को भी मार डाला । इस प्रकार पुत्रों का वध होने से दु:खित एवं रोती हुई द्रोपती को देखकर अर्जुन ने अश्वत्थामा को परास्तकर ऐषिक नामक अस्त्र से उसकी शिरोमणि को निकाल लिया । उसके बाद अत्यंत शोक संतप्त स्त्रीजनों को आश्वस्त करके धर्मराज युधिष्ठिर ने स्नान करके देवता और पितृजनों का तर्पण किया । तत्पश्चात भीष्म के द्वारा दिए गए सदुपदेशों से आश्वस्त महात्मा युधिष्ठिर पुन: राज्य कार्य में लग गए ।

अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करके उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया तथा विधिवत ब्राह्मणों को दक्षिणादि देकर संतुष्ट किया । साम्ब के पेट से निकले हुए मूसल के द्वारा यदुवंशियों के विनाश का समाचार सुनकर उन्होंने राज्य सिंहासन पर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को बैठाकर भीमादि अपने सभी भाइयों सहित विष्णु सहस्त्रनाम का जप करते हुए स्वयं भी स्वर्ग के मार्ग का अनुगमन किया । वासुदेव कृष्ण असुरों को व्यामोहित करने के लिए बुद्ध रूप में अवतरित हुए । अब वे कल्कि होकर फिर संभल ग्राम में अवतार लेंगे और घोड़े पर सवार होकर वे संसार के सभी विधर्मियों का विनाश करेंगे । अधर्म को दूर करने के लिए , सत्व गुण प्रधान देवता आदि की रक्षा और दुष्टों का संहार करने के निमित्त भगवान विष्णु का समय-समय पर वैसे ही अवतार होता है , जैसे समुद्र मंथन के समय धन्वन्तरि होकर

उन्होंने देवता आदि की रक्षा के लिए विश्वामित्र के पुत्र महात्मा सुश्रुत को आयुर्वेद का उपदेश दिया । इस तरह महाभारत की कथा एवं भगवान के अवतारों की कथा का मैंने वर्णन किया । इसे सुनकर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है ।

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