श्री साईं गाथा (गूढ़ साईं)

श्री साईं गाथा (गूढ़ साईं)

बाबा के क्रोधित होने और शांत रहने के पीछे एक रहस्य होता था । उनका यह खेल भले ही गूढ़ होता था , लेकिन उसके पीछे कोई न कोई रहस्य होता था ।बाबा कभी-कभी घंटों चुपचाप बैठे रहते थे तो कभी-कभी भक्तों के साथ घंटों हंसी ठिठोली करते रहते थे । मन में आने पर किसी भक्त को उपदेश देकर उसका मार्गदर्शन भी करते थे । कभी समाधि में रमे रहते तो कभी बाहरी दुनिया में रम जाते थे । कभी स्वानंद में मग्न रहते तो कभी क्रोधाग्नि में चिल्लाते थे । कभी खंडयोग का प्रयोग कर अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर लेते थे तो कभी अदृश्य हो जाते थे । कभी मन्दिर में पालना बांधकर राम जन्म और कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाते तो कभी मुसलमान भक्तों के साथ मिलकर संदल निकालते । (संदल- एक प्रकार की यात्रा प्रथा है जो साईं भक्त अमीर शक्कर ने शुरू की थी ) । बाबा कभी कुस्तियों का दंगल करवाते तो कभी विजेता को तमगा और पगड़ी पहनाकर उसे सम्मानित करते थे ।

गोकुलाष्टमी का आयोजन करने वाले साईं , मुहर्रम भी मनाते थे । साईं बाबा सचमुच तर्कातीत थे । अगर उन्हें हिंदू कहा जाए तो वह सतत मस्जिद में रहते थे और मुख से हमेशा ‘अल्लाह मालिक’ और ‘अल्लाह भला करेगा’ कहते थे । और कोई उन्हें मुसलमान कहे तो वे मन्दिर में धुनी जलाते थे और शंख घंटी भी बजाते थे । मस्जिद के खम्भे को टेक कर बैठने वाले साईं कुरान के संदर्भ में ऐसी दलील देते थे कि मुल्ला मौलवी भी आश्चर्यचकित रह जाते थे । भगवान के बारे में ऐसा प्रवचन देते थे कि बड़े से बड़े विद्वान ब्राह्मणों के लिए वह नयी बात होती थी । साईं के बोलने चलने आदि का अर्थ कभी कोई नहीं समझ पाया । साईनाथ एक गूढ़ परमेश्वरीय तत्व थे ।

ईश्वर पर प्रगाढ़ श्रद्धा रखने वाला और किसी भी परिस्थिति में अपनी श्रद्धा को न छोड़ने वाला भक्त उन्हें बहुत प्रिय होता था । साईं के कुछ भक्त उनके बहुत करीबी और आत्मीय थे । उन्हीं में से एक थे रामचंद्र आत्माराम तर्खड । तर्खड का जीवन बाबामय में हो चुका था और साईं ही उनकी अंतिम विश्राम स्थल थे । तर्खड की साईं भक्ति असीम थी ‌। मुंबई के बांद्रा परिसर में रहने वाले बाबा साहेब तर्खड का व्यक्तित्व पहले कुछ अलग था । उनके विचार अति आधुनिक थे और वे मूर्ति पूजा का विरोध करते थे । एक बड़ी मिल कंपनी में ऊंचे पद पर आसीन तर्खड की पत्नी को साईं पर अपार श्रद्धा थी । उनका बेटा भी साईं प्रेम में डूबा हुआ था । बाबासाहेब तर्खड के घर चांदी के मंदिर में साईं बाबा की तस्वीर सजा कर रखी गई थी । वहां साईं की त्रिकाल पूजा होती थी । तर्खड का बेटा सदैव साईं भक्ति में लीन रहता था । साईं को नैवेद्य दिखाए बिना अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करता था । वह सुबह स्नान करने के बाद बाबा की तस्वीर की मन- कर्म- वचन से पूजा करके नैवेद्य अर्पण करता था ।

तर्खड की पत्नी को कई दिनों से शिर्डी जाने की इच्छा थी । इस पर बाबासाहेब ने अपनी पत्नी को बेटे के साथ शिर्डी जाने की आज्ञा दी । बेटा शिर्डी जाने को तैयार नहीं था । उसका कहना था कि अगर वह शिर्डी गया तो घर के मंदिर में विराजे साईं को नैवेद्य कौन दिखाएगा ? बाबासाहेब ने अपने बेटे को स्वयं साईं बाबा को नैवेद्य अर्पण करने का वचन दिया । इस पर बेटे ने उन से निवेदन किया कि यदि आप सच में साईं बाबा को नैवेद्य दिखाने वाले हैं और उसके बिना अन्न का सेवन नहीं करेंगे तो ही मैं मां के साथ शिर्डी जाऊंगा । बाबासाहेब ने उसे वचन दिया और उनके शब्दों पर विश्वास रखकर बेटा और मां शिर्डी के लिए रवाना हो गए ।

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