मालिक के ‘सत्तर साला अर्जुन’ की नियुक्ति

मालिक के ‘सत्तर साला अर्जुन’ की नियुक्ति

एक और आदमी ने इस बार .. जोकर को जोकरों का एमo डीo कहा .. जोकर सर्कस के मालिक का बेटा था ही … बेटे ने फिर शिकायत मालिक के रूप में खुद सुनी .. और .. आदमी को सर्कस से निकाल दिया। 

सर्कस में आदमी वैसे ही कम थे एक और कम हो गया … फिर सर्कस के मालिकान का भौकाल कम न हो इसके लिए सर्कस की मालकिन दीदी ने इसे कम किये जाने की वकालत में शहर के निजाम को खुद चिट्ठी लिखा .. शहर के आफ़िस में ऐसी कोई फ़ाइल थी ही नहीं सो चिट्ठी टेबल पर चुप रही और मालिकान का भौकाल बना रहा।

सर्कस अपने फटे तंबू में भले बदहाल हो लेकिन मालिकान हमेशा शहर के होटलों में रहते हैं .. और युवा जोश के साथ सर्कस के फेस की जिम्मेदारी के लिये .. ”मालिक के सत्तर साला अर्जुन” की नियुक्ति कर दी जाती है।

मालिक को हमेशा कर्मचारिओं की जरुरत होती है।

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