बौद्ध तीर्थ स्थल कुशीनगर

बौद्ध तीर्थ स्थल कुशीनगर

पाठकों , आज मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मंडल के अंतर्गत , जिला कुशीनगर का इतिहास बताने जा रहा हूं । कुशीनगर का इतिहास बहुत ही प्राचीन , गौरवशाली एवं समृद्ध रहा है । यह एक ऐतिहासिक क्षेत्र है ।भारतीय इतिहास में कुशीनगर का महत्वपूर्ण स्थान है । कुशीनगर का प्राचीन नाम कुशावती था । त्रेता युग में भगवान पुरूषोत्तम श्री राम के 2 पुत्र कुश और लव थे । श्रीराम के ज्येष्ठ पुत्र कुश के द्वारा ही इस प्राचीन नगरी कुशावती को बसाया गया था । इसका उल्लेख बाल्मीकि रामायण में किया गया है ।

कुशीनगर , त्रेता युग में भी आबाद था और कुश की राजधानी थी । आज इस समय उन्हीं कुश के बंशजों को कुशवाहा कच्छवाह के नाम से जानते हैं । कुशीनगर बौद्ध तीर्थ स्थल है , जहां गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था । यह स्थान राष्ट्रीय मार्ग नंबर 28 पर गोरखपुर से पूरब 50 किलोमीटर की दूरी पर , देवरिया मुख्यालय से 34 किलोमीटर और पडरौना से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।

कुशीनगर जिले का मुख्यालय , कुशीनगर से 15 किलोमीटर उत्तर रविन्द्र नगर धूस , (पडरौना) के पास स्थित है । पडरौना के नामकरण के संबंध में कहा जाता है कि भगवान राम विवाह के बाद , पत्नी सीता और अन्य सगे संबंधियों के साथ इसी रास्ते , जनकपुर से अयोध्या लौटे थे । उनके पैरों से चली गई , रौंदी गयी धरती का नाम पहले पद रामा और बाद में पडरौना के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

जनकपुर से अयोध्या लौटते समय भगवान राम और उनके साथियों ने पडरौना से पूरब ॒10 किलोमीटर की दूरी पर बहती हुई पवित्र बांसी नदी को पार किया था । आज भी जंगल सीघरपट्टी गांव से होकर गुजरने वाली बांसी नदी के इस घाट को रामघाट के नाम से जाना जाता है । यहां पर हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान और बहुत बड़ा मेला लगता है । इस रामघाट को इतना महत्व दिया गया है कि कहते हैं , “सौ काशी , न एक बांसी “। काशी में अपने जीवन का अंतिम दिन बिताने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है और यहां बांसी नदी में स्नान करने से व्यक्ति पुण्य का भागीदार होता है । जीवन के समस्त अवरोधों से मुक्ति मिलती है । काशी में 100 बार डुबकी लगाना और बांसी में एक बार डुबकी लगाने के बराबर होता है । यहां राम ने बारातियों संग रात्रि विश्राम किया था और सुबह स्नान किए थे । तथा शिवलिंग बनाकर पूजा भी किए थे । बाद में वहां शिवलिंग वाले स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया ।

कुशीनगर के निकट एक सरिता नाला बहती है , जिसे हिरण्यवती नदी कहते हैं । इसी के किनारे मल्लों का शालवन था । बुद्ध को कुशीनगर से राजगृह जाते समय कुकुत्था नदी को पार करना पड़ता था , आजकल इसे ही बरही नदी कहते हैं । यह कुशीनगर से 12 किलोमीटर की दूरी पर बहती है । कुशीनगर के अंतर्गत एक बड़ी गंडक नदी , जिसे नारायणी कहते हैं , बहती है । इस नदी को नेपाल की तराई में सालग्रामी नदी और मैदानी इलाके में नारायणी व सप्तगंडकी कहते हैं । पनियहवा घाट पर साधु-संतों और श्रद्धालु स्नान ध्यान करते हैं । एक छोटी गंडक कुशीनगर के पश्चिम 5 किलोमीटर की दूरी पर हेतिमपुर से होकर गुजरती है , जिस पर भी अनेकों घाट बनाए गये हैं जहां श्रद्धालु स्नान ध्यान कर पूजा पाठ करते हैं ।

कुशीनगर में अनेक सुंदर बौद्ध मंदिर है । इसी कारण से यह एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी है , जहां विश्व भर के बौद्ध तीर्थ यात्री भ्रमण करने के लिए आते हैं । कुशीनगर कस्बे से पूरब 20 किलोमीटर की दूरी पर बिहार राज्य शुरू हो जाता है । कुशीनगर के आसपास का क्षेत्र कृषि प्रधान यानी उपजाऊ भूमि है । यह हिमालय की तराई क्षेत्र में स्थित है । यहां की भाषा भोजपुरी भाषा है । यहां गेहूं , धान , गन्ना आदि मुख्य फसलें उगाई जाती हैं । यहां पर बुद्ध इंटरमीडिएट कॉलेज , बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय , प्रबुद्ध सोसाइटी , भिक्षु संघ , प्रबुद्ध एक्यूप्रेशर सेंटर , चंद्रमणि निःशुल्क पाठशाला , महर्षि अरविंद विद्या मंदिर तथा कई छोटे-छोटे विद्यालय हैं । कुशीनगर के आसपास का क्षेत्र , हिंदू बाहुल्य क्षेत्र है । बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर यहां एक महीने तक मेला लगता है । जिसमें आसपास की जनता और देश विदेश से श्रद्धालु आकर पूरी श्रद्धा से भाग लेते हैं , और घूम – घूम कर पूजा – अर्चना एवं दर्शन करते हैं । यह तीर्थ महात्मा बुद्ध से संबंधित है । महात्मा बुद्ध को ही भगवान मानते हैं ।

कुशीनगर जिले के पूर्व में बिहार राज्य , दक्षिण पश्चिम में देवरिया जिला , पश्चिम में गोरखपुर जिला , उत्तर पश्चिम में महाराजगंज स्थित है । कुशीनगर में वर्ष 1876 ईसवी में अंग्रेज पुरातत्वविद ए. कनिंघम और ए. सी. एल . कार्लाइल ने पुरातात्विक खुदाई कराई थी । खुदाई में मांथाकुंवर , रामा भार स्तूप और 6-10 मीटर लंबी भगवान बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा मिली थी । इन खोजों के कारण कुशीनगर का गौरव पुनर्स्थापित हुआ । जे .पी .एच. वोगेल के देख रेख में पुनः 1904 से 1912 के बीच खुदाई हुई जिसमें बुद्ध धर्म से संबंधित अनेकों बस्तुएं प्राप्त हुई । पाली साहित्य के ग्रंथ त्रिपिटक के अनुसार बौद्ध काल में यह स्थान 16 महाजनपदों में से एक था और मल्ल राजाओं की राजधानी थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग और फहियान के यात्रा वृत्तांत में भी इस प्राचीन नगर का उल्लेख मिलता है । तब इसे कुशीनारा के नाम से जाना जाता था । ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के अंत में और ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पूर्व में यहां भगवान बुद्ध का आगमन हुआ था । कुशीनगर में ही उन्होंने अपना अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया था ।

कुशीनगर के बुद्ध महिमा को , भिक्षु ज्ञानेश्वर ने विश्व के बौद्ध देशों में प्रचार प्रसार अपने स्तर से किए । आज कुशीनगर में म्यामार बुद्ध विहार , थाईलैंड बुद्ध विहार , कोरिया बुद्ध विहार , चीनी बुद्ध विहार , जापानी बुद्ध विहार , श्रीलंका बुद्ध विहार , कंबोडिया बुद्ध विहार ,एक्यूप्रेशर परिषद , प्रबुद्ध सोसाइटी , भदंत ज्ञानेश्वर बुद्ध विहार , भिक्षु संघ , गौतम बुद्ध नेशनल हॉस्पिटल सेवारत है । कुशीनगर से पूरब 16 किलोमीटर दूरी पर मल्लों का एक और गणराज्य ‘पावा ‘ था । यहां बौद्ध धर्म के समानांतर ही जैन धर्म का प्रभाव था । माना जाता है कि जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर महावीर स्वामी ने पावा नगर , (फाजिल नगर) में ही परिनिर्वाण प्राप्त किया था । इन दो धर्मों के अलावा प्राचीन काल से ही यह स्थल सनातन हिंदू धर्मावलंबियों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है । फाजिल नगर के पास ग्राम जोगिया जनूबी पट्टी में भी एक प्राचीन मंदिर के अवशेष है , जहां बुद्ध की अतिप्राचीन मूर्ति खंडित अवस्था में पड़ी हुई है । गांव वाले इस मूर्ति को जोगीर बाबा कहते हैं ।

गुप्त काल के तमाम भग्नावशेष आज भी इस कुशीनगर जिले में फैले पड़े हैं । इनमें लगभग डेढ़ दर्जन ऐसे प्राचीन टीले हैं , जिसे पुरातात्विक विभाग ने महत्व को समझते हुए संरक्षित घोषित कर दिया है ।

उत्तर भारत का एकमात्र सूर्य मंदिर भी इसी जिले के तुर्कपट्टी में स्थित है । भगवान सूर्य की गुप्तकालीन प्रतिमा खुदाई में मिली थी ।

यहां एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है और कुशीनगर के नाम से ट्रेन भी चलती है ,जिसका नाम कुशीनगर एक्सप्रेस है।

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